संस्कृति

मुहर्रम से पहले सरायकेला-खरसावां में पुलिस का फ्लैग मार्च, शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील

मुहर्रम से पहले सरायकेला-खरसावां में पुलिस का फ्लैग मार्च, शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील

सरायकेला-खरसावां | मुहर्रम पर्व को शांतिपूर्ण एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न कराने के उद्देश्य से सरायकेला-खरसावां जिला पुलिस ने शुक्रवार को जिले के विभिन्न थाना क्षेत्रों में फ्लैग मार्च निकाला। फ्लैग मार्च के माध्यम से पुलिस प्रशासन ने आम नागरिकों में सुरक्षा का भरोसा कायम करते हुए आपसी भाईचारे और शांति के साथ पर्व मनाने की अपील की।

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फ्लैग मार्च में संबंधित थाना प्रभारी, पुलिस पदाधिकारी तथा पुलिस जवान शामिल हुए। इस दौरान संवेदनशील क्षेत्रों, प्रमुख चौक-चौराहों एवं मुख्य मार्गों पर मार्च करते हुए पुलिस अधिकारियों ने लोगों से संवाद स्थापित किया और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करने की अपील की।

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पुलिस अधिकारियों ने नागरिकों से किसी भी प्रकार की अफवाहों पर ध्यान नहीं देने तथा सोशल मीडिया पर भ्रामक या आपत्तिजनक संदेश साझा करने से बचने का अनुरोध किया। साथ ही उन्होंने किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तत्काल नजदीकी थाना या पुलिस प्रशासन को देने की अपील की।

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जिला पुलिस ने स्पष्ट किया कि मुहर्रम के दौरान जिले में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की गई है। संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखी जाएगी तथा शांति एवं कानून-व्यवस्था भंग करने या माहौल खराब करने का प्रयास करने वाले असामाजिक तत्वों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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प्रशासन ने जिलेवासियों से मुहर्रम पर्व को आपसी सद्भाव, भाईचारे एवं सामाजिक सौहार्द के साथ मनाने तथा जिले में शांति व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करने की अपील की।

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मोहर्रम पर पश्चिमी सिंहभूम में सुरक्षा के कड़े इंतजाम, ड्रोन निगरानी के बीच 24×7 कंट्रोल रूम सक्रिय

मोहर्रम पर पश्चिमी सिंहभूम में सुरक्षा के कड़े इंतजाम, ड्रोन निगरानी के बीच 24×7 कंट्रोल रूम सक्रिय


चाईबासा | मोहर्रम पर्व के मद्देनज़र पश्चिमी सिंहभूम जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन ने जिलेभर में व्यापक सुरक्षा एवं विधि-व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए हैं। पर्व को शांतिपूर्ण, सौहार्दपूर्ण और सुरक्षित वातावरण में संपन्न कराने के उद्देश्य से संवेदनशील एवं अतिसंवेदनशील क्षेत्रों सहित सभी प्रमुख जुलूस मार्गों, चौक-चौराहों तथा भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर पर्याप्त संख्या में दंडाधिकारियों, पुलिस पदाधिकारियों एवं पुलिस बल की प्रतिनियुक्ति की गई है।

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विधि-व्यवस्था की सतत निगरानी के लिए जिला स्तरीय कंट्रोल रूम 24×7 संचालित किया जा रहा है। कंट्रोल रूम में प्राप्त होने वाली प्रत्येक सूचना पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है।

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इसके अलावा, जिले के विभिन्न स्थानों पर ड्रोन कैमरों के माध्यम से जुलूस मार्गों और अन्य गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है, ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि अथवा अप्रिय स्थिति की सूचना तत्काल प्राप्त होने पर आवश्यक कार्रवाई की जा सके।

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उपायुक्त मनीष कुमार और पुलिस अधीक्षक अमित रेनू स्वयं जिले की विधि-व्यवस्था की लगातार मॉनिटरिंग कर रहे हैं। वहीं, वरीय प्रशासनिक एवं पुलिस पदाधिकारी विभिन्न क्षेत्रों का लगातार भ्रमण कर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा ले रहे हैं और प्रतिनियुक्त दंडाधिकारियों एवं पुलिस पदाधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश भी दे रहे हैं।

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जिला प्रशासन ने सभी मोहर्रम इंतजामिया कमेटियों, अखाड़ा समितियों एवं आम नागरिकों से आपसी भाईचारा, सामाजिक सौहार्द और शांति बनाए रखते हुए पर्व मनाने की अपील की है। साथ ही, अफवाहों पर ध्यान नहीं देने तथा किसी भी प्रकार की भ्रामक सूचना या संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तत्काल जिला नियंत्रण कक्ष या निकटतम पुलिस थाना को देने का आग्रह किया है।

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प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि विधि-व्यवस्था भंग करने, अफवाह फैलाने अथवा सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास करने वाले असामाजिक तत्वों के विरुद्ध नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाएगी। जिला प्रशासन ने कहा कि सभी समुदायों के सहयोग से मोहर्रम पर्व को शांतिपूर्ण, सुरक्षित और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न कराना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

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हेमंत सोरेन की नीतियों से प्रभावित होकर सैकड़ों लोगों ने थामा झामुमो का दामन

हेमंत सोरेन की नीतियों से प्रभावित होकर सैकड़ों लोगों ने थामा झामुमो का दामन

चाईबासा | झारखंड के मुख्यमंत्री एवं झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन की जनहितकारी नीतियों और विकास कार्यों से प्रभावित होकर सारंडा एवं गुआ क्षेत्र के सैकड़ों समर्थकों ने शनिवार को झामुमो की सदस्यता ग्रहण की। इसकी जानकारी झामुमो जिला प्रवक्ता बुधराम लागुरी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

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चाईबासा परिसदन में आयोजित एक सादे समारोह में राज्य के मंत्री दीपक बिरुआ की उपस्थिति में सुखराम सांडिल, नीरज चौबे, रामेश्वर चाम्पिया, राजू गोप, कुरशो देवगम, बुधराम सिद्धू, सुमित दास तथा जगदीश कोड़ा के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों ने झामुमो की सदस्यता ली।

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इस अवसर पर झामुमो जिला अध्यक्ष सोनाराम देवगम, जिला सचिव राहुल आदित्य, जिला कोषाध्यक्ष सुभाष बनर्जी, जिला उपाध्यक्ष इकबाल अहमद, जिला संयुक्त सचिव विश्वनाथ बाड़ा, छात्र मोर्चा जिला अध्यक्ष सनातन पिंगुआ, छात्र मोर्चा जिला सचिव अनुज पूर्ति, जिला संगठन सचिव बृन्दावन गोप तथा सारंडा मानकी लादूरा देवगम सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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सदस्यता ग्रहण करने वाले नए सदस्यों ने कहा कि वे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की जनहितकारी नीतियों, विकास कार्यों तथा जनसरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से प्रभावित होकर पार्टी से जुड़े हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि झामुमो के नेतृत्व में राज्य के आदिवासी, मूलवासी, किसान, मजदूर और युवाओं के हितों की रक्षा लगातार की जा रही है।

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इस अवसर पर मंत्री दीपक बिरुआ एवं अन्य नेताओं ने सभी नए सदस्यों का पार्टी में स्वागत करते हुए कहा कि उनके जुड़ने से संगठन को और अधिक मजबूती मिलेगी।

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उन्होंने कार्यकर्ताओं से गांव-गांव जाकर सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने तथा संगठन को जमीनी स्तर पर और सशक्त बनाने का आह्वान किया।

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कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता एवं स्थानीय लोग उपस्थित रहे। नए सदस्यों ने झामुमो की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने और संगठन को मजबूत बनाने का संकल्प लिया। इस मौके पर मंत्री दीपक बिरुआ, जिलाध्यक्ष सोनाराम देवगम तथा अन्य जिला पदाधिकारियों ने नए सदस्यों का फूल-माला पहनाकर स्वागत किया।

मुरुप गांव में रोजो संक्रांति पर पारंपरिक छऊ नृत्य महोत्सव का भव्य आयोजन

मुरुप गांव में रोजो संक्रांति पर पारंपरिक छऊ नृत्य महोत्सव का भव्य आयोजन

सरायकेला | सरायकेला प्रखंड के मुरुप गांव में रोजो संक्रांति के अवसर पर पारंपरिक छऊ नृत्य महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी आयोजित महोत्सव में कलाकारों की मनमोहक प्रस्तुतियों ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया और सभी का दिल जीत लिया।

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महोत्सव में मुरुप एवं घोड़ालांग छऊ नृत्य दल के चयनित कलाकारों ने अपनी उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन किया। मुरुप छऊ नृत्य दल का नेतृत्व छऊ गुरु लालमोहन महतो ने किया, जबकि घोड़ालांग छऊ नृत्य दल का नेतृत्व जगदीश महतो ने संभाला।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुरुप छऊ नृत्य दल द्वारा गणेश वंदना की प्रस्तुति से हुआ।

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इसके पश्चात कलाकारों ने भगवान गणेश, भगवान शिव, मां दुर्गा सहित विभिन्न पौराणिक पात्रों के साथ-साथ बाघ, भालू, हिरण, हाथी और घोड़े जैसे पशु-पक्षियों के आकर्षक मुखौटे धारण कर पारंपरिक छऊ नृत्य प्रस्तुत किया। ढोल-नगाड़ों की गूंज और कलाकारों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय एवं उत्साहपूर्ण बना दिया।

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महोत्सव का समापन घोड़ालांग छऊ नृत्य दल द्वारा प्रस्तुत प्रसिद्ध ‘गयासुर पाषाण’ नृत्य से हुआ, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।

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छऊ नृत्य महोत्सव का आनंद लेने के लिए मुरुप समेत आसपास के दर्जनों गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण, कला प्रेमी एवं दर्शक पहुंचे। रातभर चले इस सांस्कृतिक आयोजन में लोगों ने सरायकेला की समृद्ध छऊ परंपरा और लोक संस्कृति का भरपूर आनंद उठाया।

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इस अवसर पर छऊ गुरु लालमोहन महतो, ग्राम प्रधान जीतमोहन महतो, मणी प्रधान, लखी प्रमाणिक, भैरब प्रधान, जगदीश प्रधान, फुलचंद प्रमाणिक, दिलमोहन महतो, दामोदर प्रमाणिक, दिनेश हो, जगत किशोर प्रधान, रमण प्रधान, हेमसागर प्रधान, साधु चरण महतो सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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नलिता गांव में रोजो पर्व पर छऊ नृत्य एवं मेले का भव्य आयोजन

नलिता गांव में रोजो पर्व पर छऊ नृत्य एवं मेले का भव्य आयोजन

चक्रधरपुर | प्रखंड के नलिता पंचायत अंतर्गत नलिता गांव में रोजो पर्व के अवसर पर पारंपरिक छऊ नृत्य एवं मेले का भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. विजय सिंह गागराई मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

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कार्यक्रम के दौरान कलाकारों ने रामायण, महाभारत एवं अन्य पौराणिक कथाओं पर आधारित मनमोहक छऊ नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। वहीं मेले में विभिन्न प्रकार की दुकानों एवं मनोरंजन के साधनों ने भी लोगों को आकर्षित किया, जिसका ग्रामीणों ने जमकर आनंद उठाया।

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अपने संबोधन में डॉ. विजय सिंह गागराई ने कहा कि छऊ नृत्य हमारी सांस्कृतिक पहचान और पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने युवाओं से अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं से जुड़ने तथा लोककलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

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उन्होंने आयोजन समिति को सफल आयोजन के लिए बधाई देते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देते हैं।

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कार्यक्रम की अध्यक्षता आदे मुंडा ने की। आयोजन को सफल बनाने में सचिव गुलाब सिंह कुम्हार सहित कई ग्रामीणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

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इस अवसर पर हजारों की संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे और देर रात तक चले छऊ नृत्य एवं मेले का आनंद उठाया। कार्यक्रम शांतिपूर्ण एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।

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सरायकेला: जय माँ गायत्री छऊ नृत्य संस्था के सांस्कृतिक कार्यक्रम में छऊ कला की गूंज, सोनाराम बोदरा ने किया उद्घाटन

सरायकेला: जय माँ गायत्री छऊ नृत्य संस्था के सांस्कृतिक कार्यक्रम में छऊ कला की गूंज, सोनाराम बोदरा ने किया उद्घाटन

सरायकेला | जय माँ गायत्री छऊ नृत्य संस्था, छोटा टंगरानी के तत्वावधान में शुक्रवार देर रात एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन जिला परिषद अध्यक्ष सोनाराम बोदरा ने फीता काटकर किया। इस अवसर पर उन्होंने कलाकारों का उत्साहवर्धन करते हुए संस्था के प्रयासों और आयोजन की सराहना की।

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कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सोनाराम बोदरा ने कहा कि छऊ नृत्य हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पहचान और गौरव का प्रतीक है। यह लोककला हमारी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवंत बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

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उन्होंने कहा कि छऊ नृत्य के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करने में ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों की अहम भूमिका होती है।

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सांस्कृतिक कार्यक्रम में कलाकारों ने आकर्षक छऊ नृत्य के साथ-साथ विभिन्न लोक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कलाकारों की शानदार प्रस्तुति को दर्शकों ने खूब सराहा। जिला परिषद अध्यक्ष ने भी कलाकारों के प्रदर्शन की प्रशंसा करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं तथा संस्था के निरंतर प्रयासों की सराहना की।

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देर रात तक चले इस कार्यक्रम में क्षेत्र के बड़ी संख्या में ग्रामीण, कला प्रेमी और गणमान्य लोग उपस्थित रहे। पूरे आयोजन के दौरान पारंपरिक लोककला और सांस्कृतिक उत्साह की मनमोहक छटा देखने को मिली।

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कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, कलाकारों और दर्शकों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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चक्रधरपुर: भगवान बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित

चक्रधरपुर: भगवान बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित

चक्रधरपुर | आदिवासी मित्र मंडल, पोटका (चक्रधरपुर) कमिटी की ओर से सोमवार को महान स्वतंत्रता सेनानी एवं ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा का शहादत दिवस श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विभिन्न सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों ने भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

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कार्यक्रम के दौरान आयोजित श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए आदिवासी मित्र मंडल के सह सचिव विजय सिंह सामाड ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा ने जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अस्मिता की रक्षा के लिए विदेशी हुकूमत के विरुद्ध ‘उलगुलान’ (महाक्रांति) का शंखनाद किया था।

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उन्होंने मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में अदम्य साहस, वीरता और कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए अंग्रेजों तथा शोषकों के खिलाफ संघर्ष किया। साथ ही समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर कर एक सशक्त, संगठित और स्वाभिमानी समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

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उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम उनके बताए सिद्धांतों पर चलें तथा जल, जंगल, जमीन और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए एकजुट होकर प्रयास करें।

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शहादत दिवस के अवसर पर चक्रधरपुर प्रखंड एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण शामिल हुए। कार्यक्रम में युवा पीढ़ी को भगवान बिरसा मुंडा के गौरवशाली इतिहास, संघर्ष और योगदान से अवगत कराया गया। इस दौरान परिसर “भगवान बिरसा मुंडा अमर रहें” और “धरती आबा जिंदाबाद” के नारों से गुंजायमान रहा।

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कार्यक्रम में आदिवासी मित्र मंडल के सचिव सुखराज सुरीन, कोषाध्यक्ष देवानंद मुर्मू, सह सचिव विजय सिंह सामाड, सलाहकार समिति अध्यक्ष कालिया जामुदा, वार्ड पार्षद रवि बांकिरा, योगेन्द्र मुण्डारी, इन्द्रजीत सामाड, सोनाराम लोवादा, महावीर बोदरा, अनिल सामाड, पूर्ण चंद्र जामुदा, कुंवर सिंह कोड़ा, सतीश चन्द्र कोया सहित क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, विभिन्न पंचायतों के प्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।

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खरसावां में सामाजिक बैठक आयोजित, शिक्षा, नशामुक्ति और संस्कृति संरक्षण पर हुई चर्चा

खरसावां में सामाजिक बैठक आयोजित, शिक्षा, नशामुक्ति और संस्कृति संरक्षण पर हुई चर्चा

खरसावां | खरसावां प्रखंड अंतर्गत बिटापुर पंचायत के सरना स्थल मोसोडीह में सामाजिक परंपराओं, शिक्षा, नशामुक्ति, विवाह संस्कार, जन्म एवं मरण संस्कार, कला-संस्कृति तथा भाषा-संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विषयों को लेकर एक सामाजिक बैठक का आयोजन किया गया। बैठक की अध्यक्षता ग्राम प्रधान मंगल उरांव ने की।

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बैठक में समाज के रीति-रिवाजों एवं पारंपरिक मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन पर विस्तृत चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि बदलते समय में अपनी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक मूल्यों और परंपराओं को संरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने युवाओं को शिक्षा के प्रति जागरूक होने तथा नशापान जैसी सामाजिक बुराइयों से दूर रहने का संदेश दिया।

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इस दौरान सामाजिक एकता को सुदृढ़ बनाने, पारंपरिक संस्कारों के उचित निर्वहन तथा समाज के सर्वांगीण विकास के लिए सामूहिक प्रयास करने पर विशेष बल दिया गया। साथ ही समाज में आपसी सहयोग और जागरूकता बढ़ाने के लिए नियमित रूप से ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

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बैठक में मुखिया इंद्रजीत उरांव, पंचायत समिति सदस्य रीमा उरांव, सुमन मिंज, धर्मेंद्र उरांव, हिरू उरांव, वीरेंद्र उरांव, जयराम उरांव, धरनीसेन उरांव, देबू उरांव, गोविंद उरांव, मथुरा उरांव, हरेंद्र उरांव, भागीरथी उरांव, संतोष उरांव, कालीचरण उरांव, मुकुंद उरांव, कार्तिक उरांव, शालिग्राम उरांव, साधु उरांव तथा दशरथ उरांव सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।

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बैठक में बिटापुर, सोखानडीह, शहरबेड़ा, नारायणडीह, कदमबेड़ा, बाधडीह, मोसोडीह, तेतुलटांड़ और पदमपुर गांवों के ग्रामीणों ने भाग लिया तथा सामाजिक मुद्दों पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सामाजिक जागरूकता बढ़ाना, पारंपरिक संस्कृति का संरक्षण करना और समाज में एकजुटता को मजबूत करना था।

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विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: ‘सोना नहीं, पेड़ ही हमारी असली विरासत’ — आदिवासियत का प्रकृति संरक्षण संदेश

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: ‘सोना नहीं, पेड़ ही हमारी असली विरासत’ — आदिवासियत का प्रकृति संरक्षण संदेश

चाईबासा | एक ओर सोने और हीरों का ढेर है, तो दूसरी ओर लहलहाता हुआ हरा-भरा पेड़। दुनिया जिसे ‘दौलत’ कहती है, वह बंजर भूमि पर पड़ी चमकती वस्तुएँ हो सकती हैं, लेकिन आदिवासी समाज की दृष्टि में वास्तविक धन वह वृक्ष है, जिसकी जड़ों में संस्कृति और जिसकी शाखाओं में भविष्य सुरक्षित है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रकृति संरक्षण और आदिवासी जीवन-दर्शन पर केंद्रित यह संदेश आज के समय में और भी प्रासंगिक हो गया है। आदिवासी समाज सदियों से जल, जंगल और जमीन को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार और आस्था का केंद्र मानता आया है।

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प्रकृति ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी
आदिवासियत का मूल भाव प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीवन जीना है। आदिवासी समुदाय के लिए पेड़ केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि देवतुल्य संरक्षक और सांस्कृतिक विरासत हैं। आज जब विकास की अंधी दौड़ में कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं, तब स्वच्छ हवा, शीतल छाया और प्राकृतिक संतुलन का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।
सोना और हीरे भले ही आर्थिक समृद्धि के प्रतीक हों, लेकिन वे न तो ऑक्सीजन प्रदान कर सकते हैं और न ही भीषण गर्मी में छाया दे सकते हैं। इसी संदर्भ में एक प्रसिद्ध कथन याद आता है— “जब आखिरी पेड़ काट दिया जाएगा, आखिरी नदी प्रदूषित हो जाएगी और आखिरी मछली पकड़ ली जाएगी, तब इंसान को समझ आएगा कि वह पैसों को खा नहीं सकता।”

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इस वर्ष की थीम: प्रकृति से प्रेरित, भविष्य के लिए समर्पित
इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस की थीम “Inspired by Nature. For Climate. For Our Future” (प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।) रखी गई है। इसके साथ ही दुनिया भर में #NowForClimate अभियान चलाया जा रहा है।
यह थीम आदिवासी जीवन-दर्शन से पूरी तरह मेल खाती है। आदिवासी समाज सदैव प्रकृति को अपना गुरु मानता रहा है। जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती का समाधान प्रकृति के संरक्षण में ही निहित है। जंगल कार्बन अवशोषित करते हैं, नदियाँ जीवन देती हैं और पर्वत प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं।

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विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान और चरम मौसमीय घटनाओं के दौर में टिकाऊ जीवनशैली अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
जल, जंगल और जमीन से जुड़ा अस्तित्व
आदिवासी समाज का भूमि से रिश्ता केवल स्वामित्व का नहीं, बल्कि श्रद्धा और जिम्मेदारी का है। समुदाय यह भलीभांति समझता है कि जंगलों का अस्तित्व ही मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। वृक्ष ऑक्सीजन, फल, औषधियाँ और प्राकृतिक संतुलन प्रदान करते हैं, जो जीवन के लिए अनिवार्य हैं।

जलवायु संकट के दौर में आदिवासियत की प्रासंगिकता
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से जूझ रही है। ऐसे समय में आदिवासी संस्कृति का प्रकृति-केंद्रित जीवन-दर्शन एक महत्वपूर्ण समाधान प्रस्तुत करता है। यह समाज हमेशा आवश्यकता भर ही प्रकृति से लेने और उसके संरक्षण को प्राथमिकता देने की सीख देता रहा है।
आदिवासी मान्यता के अनुसार, सोना-चांदी और हीरे जीवन की वास्तविक जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते। कठिन परिस्थितियों में जीवन बचाने का आधार हरियाली, जल स्रोत और स्वच्छ वातावरण ही होते हैं। यही कारण है कि पर्यावरण दिवस हमें यह याद दिलाता है कि मनुष्य प्रकृति का मालिक नहीं, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा है।
आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली की विरासत
पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए समाज के बुद्धिजीवियों का कहना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो प्रकृति और मानव जीवन के बीच की दूरी बढ़ा दे। आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देने के लिए वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण समय की मांग है।
आदिवासी समाज का मानना है कि वास्तविक विरासत सोना-चांदी नहीं, बल्कि वे पेड़ हैं जिन्हें हम अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़कर जाते हैं।
“पेड़ लगाइए, जीवन बचाइए। क्योंकि प्रकृति है, तभी हम हैं।”

रांची: छऊ कला और नाट्य परंपरा पर विशेष व्याख्यान-प्रदर्शन आयोजित, गुरु तपन कुमार पटनायक ने साझा की कला की विरासत

रांची: छऊ कला और नाट्य परंपरा पर विशेष व्याख्यान-प्रदर्शन आयोजित, गुरु तपन कुमार पटनायक ने साझा की कला की विरासत

रांची | संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित “प्रातः स्मरण” कार्यक्रम के तहत रविवार को रांची स्थित ऑडिटोरियम सभागार में छऊ कला एवं नाट्य परंपरा पर विशेष व्याख्यान-प्रदर्शन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम पर्यटन, कला-संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग, झारखंड के सहयोग से आयोजित किया गया।

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कार्यक्रम में छऊ कला के वरिष्ठ गुरु एवं अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलाकार गुरु तपन कुमार पटनायक ने छऊ नृत्य की परंपरा, इतिहास, तकनीक और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने व्यावहारिक प्रदर्शन के माध्यम से छऊ नृत्य की विशिष्ट शारीरिक मुद्राओं, मुखौटों के महत्व और इसकी कलात्मक बारीकियों को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया।

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अपने संबोधन में गुरु पटनायक ने कहा कि छऊ केवल एक नृत्य शैली नहीं, बल्कि लोक जीवन, प्रकृति, आध्यात्मिकता और सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम है। उन्होंने महिषासुर वध, रामायण, महाभारत, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण तथा जन-जागरूकता जैसे विषयों पर आधारित छऊ प्रस्तुतियों का उल्लेख करते हुए इसकी सामाजिक प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

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कार्यक्रम में नाटक और लोक कला क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने भी अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन पर बल देते हुए नई पीढ़ी को लोक कलाओं से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
गुरु तपन कुमार पटनायक सरायकेला छऊ शैली के प्रमुख हस्ताक्षरों में गिने जाते हैं। छऊ कला के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वे विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं और योजनाओं के माध्यम से लोक कलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।
कार्यक्रम में कलाकारों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और कला प्रेमियों की बड़ी संख्या मौजूद रही। आयोजन का उद्देश्य भारतीय लोक एवं पारंपरिक कलाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उनके संरक्षण और संवर्धन को प्रोत्साहित करना था।