संस्कृति

आदिवासी किसान मजदूर पार्टी के बैनर तले कोल्हान क्षेत्र में शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि

आदिवासी किसान मजदूर पार्टी के बैनर तले कोल्हान क्षेत्र में शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि

खरसावां : आज आदिवासी किसान मजदूर पार्टी के बैनर तले जिला अध्यक्ष मानसिंह तिरिया एवं सरायकेला जिला अध्यक्ष सुनील गगाराई के संयुक्त तत्वावधान में कोल्हान क्षेत्र के खरसावां, सेरेंगसिया, जगन्नाथपुर और राजाबासा में शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर शहीदों के अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मानसिंह तिरिया ने कहा कि कोल विद्रोह में शहीद हुए वीरों को याद कर उन्हें नमन किया गया। उन्होंने कहा कि 1 जनवरी को कोल्हान और 2 जनवरी को कलिंगनगर में हमारे ही आदिवासी भाइयों की निर्मम हत्या की गई थी, जिसकी हम कड़ी निंदा करते हैं। अंग्रेजों ने 1 और 2 जनवरी को आदिवासियों की हत्या कर इसे अपने लिए जश्न का दिन बना लिया। इस इतिहास को जानना हर आदिवासी के लिए जरूरी है और इन दिनों को शहीद दिवस के साथ-साथ संकल्प दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य है कि जिन लोगों ने आदिवासियों पर गोलियां चलाईं, आज वही खुद को आदिवासी समाज का हितैषी बता रहे हैं।
उन्होंने कोल विद्रोह के जननायक वीर शहीद पोटो हो’ का उल्लेख करते हुए कहा कि फांसी के कई वर्षों बाद उनके नाम से राजाबासा गांव की पहचान बनी, लेकिन आज उस गांव की स्थिति बेहद दयनीय है। ग्रामीण जैंतगढ़, चंपुआ और अन्य क्षेत्रों में मजदूरी कर जीवन यापन कर रहे हैं। उन्होंने सरकार से गांव को गोद लेकर विकास पर ध्यान देने की मांग की।
मानसिंह तिरिया ने बताया कि आज ही के दिन गवर्नर जनरल के राजनीतिक एजेंट कैप्टन थॉमस विल्किंसन ने हो’ दिसुम (वर्तमान कोल्हान) के महान योद्धा पोटो हो’, नारा हो’, बड़ाय हो’, पांडुवा हो’ और बोड़ेया हो’ को फांसी की सजा सुनाई थी, जबकि अन्य सहयोगी योद्धाओं को कारावास की सजा दी गई थी।
उन्होंने कहा कि हो’ विद्रोह (1820-21), महान कोल विद्रोह (1831-32) और सेरेंगसिया घाटी युद्ध (1837) के दौरान लगभग 17 वर्षों तक अंग्रेजों और हो’ आदिवासियों के बीच भीषण संघर्ष हुआ। अंग्रेज जानते थे कि यदि पोटो हो’ और उनके साथी जीवित रहे, तो वे कोल्हान में कभी स्थायी रूप से शासन नहीं कर पाएंगे। इसी कारण 1 जनवरी 1838 को जगन्नाथपुर बाजार स्थित बरगद के पेड़ पर पोटो हो’, नारा हो’ और बड़ाय हो’ को फांसी दी गई, जबकि 2 जनवरी 1838 को सेरेंगसिया गांव में पीपल के पेड़ पर बोड़ेया हो’ और पांडुवा हो’ को फांसी दी गई। इस घटना पर लंदन बोर्ड ने भी आपत्ति जताई थी।
कार्यक्रम में सरायकेला जिला अध्यक्ष सुनील गगाराई ने कहा कि 1-2 जनवरी को फांसी देना अंग्रेजों की सोची-समझी राजनीतिक साजिश थी, ताकि आदिवासी अपने इतिहास और पूर्वजों को भूलकर नए साल के जश्न में डूबे रहें।
उन्होंने आगे कहा कि देश की आजादी के बाद 1 जनवरी 1948 को सरायकेला-खरसावां रियासत के ओडिशा में विलय और अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर खरसावां हाट मैदान में आदिवासियों की एक बड़ी शांतिपूर्ण सभा आयोजित हुई थी, जिस पर ओडिशा पुलिस ने मशीनगन से गोलीबारी की थी।
इस कार्यक्रम में चुमरू पिंगुवा, सजान देवगम, सुनील लागुरी, मदन सिंकु, नरसिंह पुर्ती, माटा करोवा, अर्जुन मुंडा, जोसेफ मुंडा, लुकुना पुर्ती, दामू बोबोंगा, सादु मुंडा, पुष्पा मुंडा, शांति पुर्ती, सरस्वती सवैया, हीरा मुनी सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित थे।

खरसावां को फूल नहीं, खून का हिसाब चाहिए, कुआँ खोदकर हो DNA जाँच, तभी साबित होगी आदिवासी हितैषी सरकार:- धी रामहरि पेरियार

खरसावां को फूल नहीं, खून का हिसाब चाहिए, कुआँ खोदकर हो DNA जाँच, तभी साबित होगी आदिवासी हितैषी सरकार:- धी रामहरि पेरियार

चाईबासा : एंटी करप्शन ऑफ इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष सह लोकसभा एवं विधानसभा प्रत्याशी रहे धी. रामहरि पेरियार ने गुरुवार को सरायकेला–खरसावां जिला अंतर्गत खरसावां स्थित शहीद स्थल पर पहुँचकर खरसावां गोलीकांड के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर उन्होंने कहा कि खरसावां गोलीकांड में 35 शहीदों पर सरकारी मुहर लगी, लेकिन आजादी के 77 वर्षों बाद भी सिर्फ 2 परिवारों को ही सरकारी संवेदना मिली। शेष 33 शहीद आज भी सरकारी ताले में बंद हैं। यह कोई प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश है, आदिवासी शहादत को इतिहास से मिटाने की साजिश।
       धी. पेरियार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि वर्तमान अबुआ सरकार वास्तव में आदिवासी हितैषी है, तो केवल मंच से भाषण देने, पुष्प अर्पित करने और औपचारिक संवेदना जताने से काम नहीं चलेगा। सरकार को खरसावां शहीद स्थल का कुआँ खुदवाकर सभी अस्थियों को बाहर निकालना होगा, DNA जाँच करानी होगी और शहीदों की पहचान कर उनके वास्तविक परिजनों तक पहुँचना होगा। तभी यह सरकार आदिवासियों की उम्मीदों की सरकार कही जाएगी।
        उन्होंने कहा कि खरसावां कोई प्रतीकात्मक स्मारक नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, संघर्ष और बलिदान का रक्तरंजित इतिहास है। जब तक 33 अज्ञात शहीदों के नाम उजागर नहीं होते, उनके परिवारों को न्याय, सम्मान और अधिकार नहीं मिलता, तब तक हर सरकार कटघरे में खड़ी रहेगी।
      धी. रामहरि पेरियार ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि खरसावां को फूल नहीं, खून का हिसाब चाहिए।
अब समय आ गया है कि अबुआ सरकार सच्चाई से भागना बंद करे और ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार कर उसे सुधारने की दिशा में ठोस कदम उठाए।
      उन्होंने मांग की कि राज्य सरकार अविलंब एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन करे, DNA परीक्षण की प्रक्रिया शुरू करे और शहीद परिवारों को शहीद का दर्जा, मुआवजा तथा सामाजिक सम्मान सुनिश्चित करे।

खरसावां शहीद दिवस की तैयारियों की समीक्षा, उपायुक्त व एसपी ने किया स्थल निरीक्षण

खरसावां शहीद दिवस की तैयारियों की समीक्षा, उपायुक्त व एसपी ने किया स्थल निरीक्षण

खरसावां : आगामी 1 जनवरी 2026 को खरसावां शहीद स्थल पर आयोजित होने वाले शहीद दिवस कार्यक्रम को लेकर जिला प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। कार्यक्रम में राज्य के मुख्यमंत्री, भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय मंत्री सहित कई मंत्री एवं विधायकगण के संभावित आगमन के मद्देनज़र उपायुक्त सरायकेला–खरसावां श्री नितिश कुमार सिंह एवं पुलिस अधीक्षक श्री मुकेश कुमार लुणायत ने संयुक्त रूप से शहीद पार्क, पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस तथा अर्जुना स्टेडियम परिसर में निर्माणाधीन हेलीपैड सहित अन्य महत्वपूर्ण स्थलों का निरीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान गेस्ट हाउस एवं हेलीपैड से जुड़े लंबित कार्यों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर पूर्ण करने का निर्देश संबंधित एजेंसियों को दिया गया। साथ ही कार्यक्रम के दौरान विधि-व्यवस्था, यातायात प्रबंधन एवं सुचारू संचालन सुनिश्चित करने के लिए संबंधित पदाधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।
प्रशासन ने सभा स्थल पर समतलीकरण, पेयजल, शौचालय, जूता-चप्पल स्टैंड सहित अन्य आधारभूत सुविधाओं की समयबद्ध व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा। इसके अलावा आगमन-प्रस्थान मार्गों एवं यातायात व्यवस्था को लेकर भी विस्तार से चर्चा की गई।
इस अवसर पर परियोजना निदेशक आईटीडीए सह उप विकास आयुक्त सुश्री रीना हांसदा, डीआरडीए निदेशक श्री अजय तिर्की, अपर उपायुक्त श्री जयवर्धन कुमार, सिविल सर्जन डॉ. सरजू प्रसाद सिंह सहित विभिन्न विभागों के वरीय पदाधिकारी उपस्थित रहे।

रामगढ़ में आदिवासी हो समाज का सामाजिक जागरूकता अभियान, मांगे पर्व मनाने की अपील

रामगढ़ में आदिवासी हो समाज का सामाजिक जागरूकता अभियान, मांगे पर्व मनाने की अपील

रामगढ़ : आदिवासी हो समाज रामगढ़ कमेटी की ओर से रविवार को सामाजिक जागरूकता अभियान चलाया गया। यह अभियान रामगढ़ के भरेचनागर सांडी गांव से शुरू हुआ।

अभियान का उद्देश्य शहरों में रह रहे हो समाज के लोगों को अपनी भाषा, संस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों के संरक्षण के प्रति जागरूक करना था। इस दौरान समाज के लोगों से अपील की गई कि वे अन्य समुदायों के बीच रहते हुए भी अपनी पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं को न भूलें तथा अपने पर्व-त्योहारों को नियमित रूप से उत्साह के साथ मनाएं।

कमेटी की ओर से 01 फरवरी 2026 को मांगे पर्व मनाने की जानकारी दी गई। साथ ही समाज के लोगों से अधिक संख्या में भाग लेने और आयोजन को सफल बनाने के लिए आर्थिक सहयोग करने की अपील की गई।

अभियान के माध्यम से समाज में एकता, सांस्कृतिक जागरूकता और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश दिया गया।

सिलायडीह में 13 वर्ष बाद आदिवासी परिवार की सरना धर्म में घर वापसी

सिलायडीह में 13 वर्ष बाद आदिवासी परिवार की सरना धर्म में घर वापसी

कुचाई : सिलायडीह गांव में रविवार को एक आदिवासी परिवार ने 13 साल बाद ईसाई धर्म छोड़कर पुनः सरना धर्म स्वीकार किया। राम मुंडा, उनकी पत्नी मंजू मुंडा और उनके तीन बच्चे—जरासन, सुनील और मेनका मुंडा—ने बोंगा–बुरू पूजा पद्धति के अनुसार शुद्धिकरण कर अपने मूल धर्म में वापसी की। शुद्धिकरण समारोह सरना धर्म गुरू शिवचरण मुंडा, वनमाली मुंडा और डोमन मुंडा द्वारा संपन्न की गई।।

मंजू मुंडा ने बताया कि 13 वर्ष पहले बच्चों की लगातार खराब तबीयत और जानकारी के अभाव में उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया था। वहीं जरासन मुंडा ने कहा कि उस समय मार्गदर्शन की कमी के कारण वे गलत दिशा में चले गए थे, लेकिन अब शिक्षा और समझ बढ़ने के साथ वे अपने मूल धर्म में लौट आए हैं। परिवार की बेटी मेनका ने समाज से अपील की कि धर्म परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण निर्णय सही जानकारी और समझ के आधार पर ही लें।

कार्यक्रम में समाजसेवी और जनप्रतिनिधि संदीप मुंडा, चमर सिंह मुंडा, मुखिया मंगल सिंह मुंडा, रविन्द्र मुंडा, रामचन्द्र सिंह मुंडा, जगन्नाथ सिंह मुंडा, केपी सेट सोय, मेघनाथ सिंह मुंडा, गुरूवा मुंडा, श्रवण सरदार, ग्राम मुंडा गणेश राम मुंडा, भूषण मुंडा, दीना मुंडा, कुशल मुंडा, जिला परिषद सदस्य जिंगी हेम्ब्रम, शम्भू सिंह मुंडा, तुलसी मुंडा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद थे।

ग्रामीणों का मानना है कि परिवार की यह घर वापसी समुदाय में सांस्कृतिक जागरूकता और अपनी परंपराओं की ओर लौटने का महत्वपूर्ण संदेश देती है।

रांची राजभवन में ‘उरांव धर्म एवं प्रथाएं’ पुस्तक का भव्य लोकार्पण – राज्यपाल ने सराहा जनजातीय ज्ञान परंपराओं का संरक्षण

रांची राजभवन में ‘उरांव धर्म एवं प्रथाएं’ पुस्तक का भव्य लोकार्पण – राज्यपाल ने सराहा जनजातीय ज्ञान परंपराओं का संरक्षण

रांची : आज राजभवन में एक भव्य एवं गरिमामय समारोह में प्रसिद्ध मानवशास्त्री शरत चंद्र राय द्वारा लिखित तथा श्री राज रतन सहाय द्वारा हिंदी में अनुवादित पुस्तक ‘उरांव धर्म एवं प्रथाएं’ का औपचारिक लोकार्पण किया गया। समारोह की अध्यक्षता माननीय राज्यपाल श्री संतोष गंगवार ने की।

करीब सौ वर्ष पूर्व लिखी गई यह महत्वपूर्ण पुस्तक उरांव जनजाति की जीवन-पद्धति, धार्मिक आस्थाओं, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित एक विस्तृत एवं शोधसमृद्ध दस्तावेज मानी जाती है। इसके हिंदी रूपांतरण से शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों के लिए जनजातीय समाज के अध्ययन का एक सुलभ स्रोत उपलब्ध हुआ है।

अपने संबोधन में राज्यपाल श्री संतोष गंगवार ने कहा कि यह पुस्तक केवल एक शोध-ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत का आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिचय है। उन्होंने अनुवाद की सहज भाषा और स्पष्ट प्रस्तुति की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह कृति मुख्यधारा के पाठकों को उरांव समाज की सोच, जीवन-दृष्टि और सांस्कृतिक धरोहर से परिचित कराती है। साथ ही उन्होंने चेताया कि पारंपरिक ज्ञान-व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, और इस तरह के साहित्यिक प्रयास समाज के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

समारोह में उपस्थित पूर्व मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुंडा ने भी पुस्तक के लोकार्पण पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जनजातीय संस्कृति और परंपराएँ किसी भी राज्य की पहचान व आत्मा होती हैं। अनुवाद कार्य को उन्होंने शब्दों का पुनर्लेखन नहीं, बल्कि भाव, संदर्भ और सांस्कृतिक संवेदनाओं के पुन:संप्रेषण की कला बताया, जो अत्यंत मूल्यवान है।

पुस्तक के अनुवादक श्री राज रतन सहाय ने इसे अपनी सेवा-भावना एवं जनजातीय समाज के प्रति समर्पण का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि इस कार्य के लिए स्वयं को नियति का चयनित मानते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इससे पहले वे शरत चंद्र राय की दो अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों—‘आदिम मुंडा एवं उनका प्रदेश’ और ‘बिरहोर’—का भी सफलतापूर्वक हिंदी अनुवाद कर चुके हैं। उनका उद्देश्य है कि जनजातीय ज्ञान-परंपराएँ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे और शोध के नए आयाम खुलें।

कार्यक्रम में पूर्व मंत्री एवं विधायक श्री रामेश्वर उरांव, पूर्व मंत्री एवं जमशेदपुर पश्चिमी के विधायक श्री सरयू राय, पूर्व सांसद श्री सुदर्शन भगत, झारखंड राय विश्वविद्यालय की कुलपति श्रीमती सविता सेंगर, पूर्व कुलपति डॉ. सत्यनारायण मुंडा, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सहित अनेक गणमान्य अतिथि, शिक्षाविद, शोधकर्ता, लेखक एवं विभिन्न जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

बारीडीह में शहीद कोका कमार करमाली की 164वीं जयंती पर भव्य समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गूंजा वातावरण

बारीडीह में शहीद कोका कमार करमाली की 164वीं जयंती पर भव्य समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गूंजा वातावरण

बारीडीह : वीर शहीद कोका कमार करमाली की 164वीं जयंती के अवसर पर बारीडीह स्थित उनके नाम पर बने चौक में भव्य समारोह का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम की अगुवाई प्रमुख संस्थापक बलराम कर्मकार और आयोजक राजू लोहरा ने की।

समारोह के दौरान आजाद समाज पार्टी (का.) के जिला प्रभारी सनत सिंह सरदार और संगठन एवं मीडिया प्रभारी परमबीर पात्रो को जेएमएम के नगर अध्यक्ष गोविंद लोहार और राजू लोहार द्वारा सम्मानित किया गया। वक्ताओं ने शहीद कोका कमार करमाली के योगदान को समाज के लिए प्रेरणास्रोत बताते हुए आदिवासी भाषा और संस्कृति संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।

सुबह 7 बजे माल्यार्पण के साथ जयंती समारोह की शुरुआत हुई। स्थानीय ग्रामीणों, युवाओं, महिलाओं और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर शहीद को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान लोगों ने उनके संघर्ष और आदिवासी समाज के उत्थान के लिए किए गए प्रयासों को याद किया।

शाम 6 बजे दीप प्रज्वलन के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। आदिवासी पारंपरिक नृत्य, गीत और ढोल-नगाड़ों की लय से पूरा माहौल उत्सवमय हो उठा। कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता पर आधारित प्रस्तुति ने उपस्थित दर्शकों का दिल जीत लिया।

यह आयोजन वीर शहीद कोका कमार करमाली सेना संघर्ष समिति और बिरसा सेना के संयुक्त तत्वावधान में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम में रविन्द्र लोहारा, कृष्णा लोहार, घनश्याम कर्मकार, राजू कंवर, मोहन कंवर, जय नारायण मुंडा, दीपक रंजीत, सुनील सोरेन, दिवान सोरेन, सुबोध लोहार, राजा राय मुर्मू, सुनील हेंब्रम, जेरी सोरेन, पंकज लोहार, मिहिलाय मुर्मू, दीप लोहार, बेसराम चाय, असमान बाजरे, राजू राम, डॉ. रवी प्रसाद, भोलाराम कंवर, बिनोद कंवर समेत अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीणों की सहभागिता रही।

कार्यक्रम के अंत में आयोजक बलराम कर्मकार और राजू लोहरा ने सभी सहयोगियों एवं उपस्थित लोगों का हृदय से आभार प्रकट किया। समारोह शांतिपूर्ण और गरिमामय माहौल में संपन्न हुआ।

तितिरबिला में ग्राम देवी जहेरा स्थल का विधायक दशरथ गागराई ने किया उद्घाटन

तितिरबिला में ग्राम देवी जहेरा स्थल का विधायक दशरथ गागराई ने किया उद्घाटन

सरायकेला_खरसावाँ : सरायकेला प्रखंड के नुवागांव पंचायत अंतर्गत तितिरबिला गांव में सोमवार को ग्राम देवी जहेरा स्थल का उद्घाटन खरसावां विधानसभा क्षेत्र के विधायक श्री दशरथ गागराई ने पूजा-अर्चना व फीता काटकर किया।

इस अवसर पर विधायक दशरथ गागराई ने कहा कि ग्राम देवी गांव की रक्षा करती हैं, इसलिए उनकी पूजा पूरे सम्मान के साथ की जाती है।

उद्घाटन समारोह में मुख्य रूप से विधायक प्रतिनिधि अर्जुन उर्फ नायडू गोप, जिला उपाध्यक्ष संजय प्रधान, विधायक प्रतिनिधि पंकज प्रधान, उप प्रमुख बासुदेव महतो, प्रखंड अध्यक्ष भगत महतो, प्रकाश महतो, अरुण जामुदा, उप मुखिया कन्हैया बेहरा, लक्ष्मण महतो, सुब्रतो कोर, गोमा पुरती, संजीव महतो, मिश्री लाल महतो, उकार मांझी, लालचंद महतो, मनसा टुडू सहित झामुमो कार्यकर्ता और ग्रामीण बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

धनसारी में झारखंड स्थापना दिवस और भगवान बिरसा मुंडा जयंती धूमधाम से आयोजित

धनसारी में झारखंड स्थापना दिवस और भगवान बिरसा मुंडा जयंती धूमधाम से आयोजित

पश्चिम सिंहभूम : कुमारडुगी प्रखंड अंतर्गत भोण्डा पंचायत के धनसारी गांव में झारखंड स्थापना दिवस एवं भगवान बिरसा मुंडा जयंती का भव्य आयोजन किया गया। गांववासियों के सहयोग से कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

कार्यक्रम की शुरुआत छोटे-छोटे बच्चों द्वारा प्रभात फेरी निकालने से हुई। बच्चों ने गांव के प्रत्येक कोने में जाकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया। इसके साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित हुए, जिसमें नाचकन, जीके, ड्राइंग और भाषण प्रतियोगिताओं ने उत्साह बढ़ाया।

कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि के तौर पर माननीय मनोज पाट पिंगुवा (पूर्व BSF) शामिल हुए। साथ ही गांव के सम्मानित शिक्षक—महेश पाट पिंगुवा, चंद्र मोहन पाट पिंगुवा, सतीश पाट पिंगुवा, दुलूराम पाट पिंगुवा, कुल कोड़ा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।

इस कार्यक्रम का आयोजन उन बच्चों द्वारा किया गया जो गांव में संचालित ग्रुप स्टडी में नियमित रूप से हिस्सा लेते हैं। गांव में चार से पाँच स्थानों पर प्रतिदिन शाम को ग्रुप स्टडी चलती है। इन बच्चों ने अपने प्रयास से घर-घर जाकर जागरूकता फैलाने का बीड़ा उठाया और पूरे गांव को कार्यक्रम से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

धनसारी गांव के संयुक्त सहयोग और बच्चों के उत्साह ने इस आयोजन को विशेष और प्रेरणादायक बना दिया।

बिरसा मुंडा जयंती: शहीद की विरासत और समाज का गिरता सच

बिरसा मुंडा जयंती: शहीद की विरासत और समाज का गिरता सच

बिरसा मुंडा की जयंती: शहीद की याद या सांस्कृतिक पतन का उत्सव ?

15 नवंबर, अमर शहीद बिरसा मुंडा की जयंती—जिसे आदिवासी इतिहास में एक गौरवपूर्ण दिवस माना जाता है। वही दिन आज समाज में कैसे और किस रूप में मनाया जा रहा है, इस पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सामाजिक चिंतक लक्ष्मीनारायण मुंडा ने अपने विस्तृत लेख में इस दिन को ‘सांस्कृतिक पतन का उत्सव’ बनाने की प्रवृत्ति पर तीखी आलोचना की है।
जहां एक युवा योद्धा ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके देशी दलालों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका। लेकिन अफसोस! आज यह दिन क्या बनकर रह गया है? एक बहाना – नाचने-गाने,शराब पीने, मांस भक्षण करने और फूहड़ आर्केस्ट्रा के नाम पर अश्लीलता फैलाने का आयोजन बन कर रह गया है। जहाँ संस्कृति के नाम पर द्विअर्थी गाने बजते हैं,अश्लील नृत्य होते हैं और लोग इतने मदमस्त हो जाते हैं कि उन्हें याद भी नही रहता कि किसके नाम पर यह सब हो रहा है। यह न सिर्फ बिरसा मुंडा की आत्मा का अपमान है, बल्कि पूरे आदिवासी संघर्ष की मिट्टी पलीद करने का घिनौना प्रयास है। हमारी पीढ़ी इतनी गिर चुकी है कि शहीदों की याद को भी बाजारु मनोरंजन में बदल देती है। मेरा यह आलेख इसी कटु सत्य की गहन पड़ताल करेगा, ताकि हम समझ सकें कि कैसे हमने अपने नायकों को भुला दिया है।

बिरसा मुंडा : एक योद्धा का जीवन और उलगुलान का विद्रोह।

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में एक मुंडा आदिवासी परिवार में हुआ था। वह कोई साधारण व्यक्ति नही थे। वह एक दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की लूट और उसके सहयोगी जमींदारों-महाजनों की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। 19वीं शताब्दी के अंत में आदिवासी इलाकों में ब्रिटिशों ने जमींदारी प्रथा थोप दी थी,जिसके तहत आदिवासियों की जमीनें छीन ली जाती थी,उन्हें बंधुआ मजदूर बना दिया जाता था और सूदखोर महाजन उनके खून-पसीने को चूसते थे। बिरसा ने इससे सहन नही किया। उन्होंने ‘उलगुलान’ – अर्थात ‘महान विद्रोह’ – की शुरुआत की,जो 1899-1900 में चला।
उलगुलान कोई साधारण विद्रोह नही था। यह ‘आबुआ राज’ (हमारा राज) का सपना था – जहाँ आदिवासी अपनी जमीन,अपनी संस्कृति और अपनी स्वतंत्रता पर अपना हक जताते थे। बिरसा ने आदिवासियों को एकजुट किया,उन्हें बताया कि ब्रिटिश और उनके दलाल कैसे उनकी जड़ें काट रहे हैं। उन्होंने धार्मिक-सांस्कृतिक आंदोलन भी चलाया, जहाँ ईसाई मिशनरियों के प्रभाव से बचाव और अपनी परंपराओं की रक्षा पर जोर दिया। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार किया और 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी मौत हो गई। संभवतः जहर देकर या यातनाओं से योजनाबद्ध षडयंत्र के तहत मार दिया गया। लेकिन उनका संदेश अमर रहा “अपनी जमीन बचाओ, शोषकों के खिलाफ लड़ो।” आज जब हम उनके इस संघर्ष को याद करते हैं, तो यह प्रेरणा का स्रोत होना चाहिए – न कि मदिरा पान और फूहड़ता में मदहोश।

आज की जयंती: शहीद की याद या बाजारु तमाशा ?

दुर्भाग्य से आज बिरसा मुंडा की जयंती पूरे देश में ‘धूमधाम’ से मनाई जा रही है – लेकिन किस तरह की धूमधाम? गांवों, शहरों और आदिवासी बाहुल्य इलाकों में कार्यक्रमों के नाम पर क्या हो रहा है ? नाच-गाना,डीजे पर तेज संगीत,शराब की बोतलें खुलना,मांस की दावतें और आर्केस्ट्रा जहाँ फूहड़ डांस होते हैं। संस्कृति के नाम पर द्विअर्थी गाने बजते हैं,अश्लील नृत्य होते हैं और युवा पीढ़ी इतनी मदहोश हो जाती है कि उन्हें पता भी नही चलता कि यह दिन किसके लिए है। क्या यही है बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि ? क्या उनका उलगुलान इसीलिए था कि हम उनकी याद में मदिरा पीकर नाचें और अपनी संस्कृति को अश्लीलता में डुबो दें?
यह कटु सत्य है कि हमारी समाज ने शहीदों को कमर्शियलाइज कर दिया है। राजनीतिक दल और स्थानीय नेता इस दिन को वोट बैंक की राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हैं – रैलियां निकालते हैं, भाषण देते हैं,लेकिन शाम होते ही सब कुछ पार्टी में बदल जाता है। आदिवासी इलाकों में जहाँ बिरसा ने जमीन के लिए लड़ाई लड़ी,आज भी शोषण जारी है – कॉर्पोरेट लूट,खनन कंपनियां और विकास के नाम पर विस्थापन इत्यादि। लेकिन जयंती पर कोई इन मुद्दों पर कोई बात नही करता है। इसके बजाय फूहड़ कार्यक्रम होते हैं जहाँ महिलाओं को ऑब्जेक्टिफाई किया जाता है और पुरुष मदिरा में डूबकर अपनी मर्दानगी दिखाते हैं। यह न सिर्फ बिरसा मुंडा का अपमान है,बल्कि पूरे आदिवासी समाज की गरिमा का मखौल है। हम इतने गिर चुके हैं कि शहीद की याद को भी ‘एन्जॉयमेंट’ में बदल देते हैं – जैसे कोई त्योहार हो, न कि संघर्ष की याद। क्या बिरसा मुंडा ने इसके लिए जान दी थी ? क्या उलगुलान का मतलब यही था – शराब और अश्लीलता ?
यह स्थिति और भी दुखद तब हो जाती है जब हम देखते हैं कि युवा पीढ़ी को बिरसा मुंडा के बारे में कुछ पता ही नही है। स्कूलों में उनके बारे में पढ़ाया जाता है,लेकिन वह किताबी ज्ञान बनकर रह जाता है। जयंती पर वे नाचते हैं,पीते हैं और अगले दिन भूल जाते हैं। यह सांस्कृतिक पतन है – जहाँ परंपराएं विकृत हो रही हैं और शहीदों की विरासत को बाजारु मनोरंजन में बेच दिया जा रहा है। अगर बिरसा आज जीवित होते, तो शायद वे फिर से उलगुलान का बिगुल फूंकते – इस बार अपने ही लोगों की अज्ञानता और पतन के खिलाफ।

बिरसा मुंडा के संदेश की आज की प्रासंगिकता।

बिरसा मुंडा का संघर्ष आज भी उतना ही समसामयिक है। आज आदिवासी इलाकों में क्या हो रहा है? विकास के नाम पर जंगलों की कटाई, खनन कंपनियों  की लूट,आदिवासियों की जमीनें छीन रही हैं और सरकारी नीतियां उन्हें मुख्यधारा से बाहर रख रही हैं। बिरसा ने ‘आबुआ राज’ का सपना देखा था – स्वशासन का, जहाँ आदिवासी अपनी किस्मत खुद लिखें। लेकिन आज हम क्या कर रहे हैं? उनकी जयंती पर मदिरा पीकर नाच रहे हैं, जबकि उनके बताए रास्ते पर चलने की बजाय हम शोषण को सहन कर रहे हैं।
उनका संदेश था – एकजुट होकर लड़ो, अपनी संस्कृति बचाओ। लेकिन आज संस्कृति के नाम पर क्या बच रहा है? फूहड़ डांस और अश्लील कार्यक्रम ? यह तो संस्कृति का विनाश है। बिरसा ने ब्रिटिश दलालों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन आज के दलाल – राजनीतिक नेता, एनजीओ और कॉर्पोरेट – उनके नाम पर पैसा कमा रहे हैं। जयंती पर अगर हम सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो उनके संघर्ष से प्रेरणा लें। आदिवासी अधिकारों के लिए आवाज उठाएं, जमीन बचाने के लिए लड़ें और सांस्कृतिक शुद्धता बनाए रखें। लेकिन अफसोस हमारी पीढ़ी इतनी कमजोर और स्वार्थी हो चुकी है कि शहीदों को भी ‘पार्टी’ में बदल देती है।
बिरसा मुंडा की जयंती कोई उत्सव नही, बल्कि चिंतन और संघर्ष का दिन होना चाहिए। हमें इस कटु सत्य को स्वीकार करना होगा कि हमने उनके बलिदान को भुला दिया है। नाच-गाना,शराब और फूहड़ता से हम उनकी आत्मा को और पीड़ा दे रहे हैं। सच्ची श्रद्धांजलि है – उनके इतिहास को पढ़ना, युवाओं को सिखाना और आज के शोषण के खिलाफ आवाज उठाना। अगर हम ऐसा नही करेंगे, तो बिरसा मुंडा जैसे नायक सिर्फ कैलेंडर की तारीख बनकर रह जाएंगे। आइए इस पतन को रोकें – वरना हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नही करेंगी। बिरसा मुंडा अमर रहें, लेकिन उनकी याद को अमर रखने की जिम्मेदारी हमारी है। जागो, वरना उलगुलान फिर से जरुरी हो जाएगा – इस बार खुद के खिलाफ !
आज बिरसा मुंडा के सपनों और उद्देश्यों के विरोधी हमारे अपने समाज के अंदर हैं।
इससे बदलना होगा।
यही वक्त की जरुरत है।