संस्कृति

चक्रधरपुर: भगवान बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित

चक्रधरपुर: भगवान बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित

चक्रधरपुर | आदिवासी मित्र मंडल, पोटका (चक्रधरपुर) कमिटी की ओर से सोमवार को महान स्वतंत्रता सेनानी एवं ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा का शहादत दिवस श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विभिन्न सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों ने भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

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कार्यक्रम के दौरान आयोजित श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए आदिवासी मित्र मंडल के सह सचिव विजय सिंह सामाड ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा ने जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अस्मिता की रक्षा के लिए विदेशी हुकूमत के विरुद्ध ‘उलगुलान’ (महाक्रांति) का शंखनाद किया था।

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उन्होंने मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में अदम्य साहस, वीरता और कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए अंग्रेजों तथा शोषकों के खिलाफ संघर्ष किया। साथ ही समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर कर एक सशक्त, संगठित और स्वाभिमानी समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

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उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम उनके बताए सिद्धांतों पर चलें तथा जल, जंगल, जमीन और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए एकजुट होकर प्रयास करें।

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शहादत दिवस के अवसर पर चक्रधरपुर प्रखंड एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण शामिल हुए। कार्यक्रम में युवा पीढ़ी को भगवान बिरसा मुंडा के गौरवशाली इतिहास, संघर्ष और योगदान से अवगत कराया गया। इस दौरान परिसर “भगवान बिरसा मुंडा अमर रहें” और “धरती आबा जिंदाबाद” के नारों से गुंजायमान रहा।

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कार्यक्रम में आदिवासी मित्र मंडल के सचिव सुखराज सुरीन, कोषाध्यक्ष देवानंद मुर्मू, सह सचिव विजय सिंह सामाड, सलाहकार समिति अध्यक्ष कालिया जामुदा, वार्ड पार्षद रवि बांकिरा, योगेन्द्र मुण्डारी, इन्द्रजीत सामाड, सोनाराम लोवादा, महावीर बोदरा, अनिल सामाड, पूर्ण चंद्र जामुदा, कुंवर सिंह कोड़ा, सतीश चन्द्र कोया सहित क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, विभिन्न पंचायतों के प्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।

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खरसावां में सामाजिक बैठक आयोजित, शिक्षा, नशामुक्ति और संस्कृति संरक्षण पर हुई चर्चा

खरसावां में सामाजिक बैठक आयोजित, शिक्षा, नशामुक्ति और संस्कृति संरक्षण पर हुई चर्चा

खरसावां | खरसावां प्रखंड अंतर्गत बिटापुर पंचायत के सरना स्थल मोसोडीह में सामाजिक परंपराओं, शिक्षा, नशामुक्ति, विवाह संस्कार, जन्म एवं मरण संस्कार, कला-संस्कृति तथा भाषा-संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विषयों को लेकर एक सामाजिक बैठक का आयोजन किया गया। बैठक की अध्यक्षता ग्राम प्रधान मंगल उरांव ने की।

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बैठक में समाज के रीति-रिवाजों एवं पारंपरिक मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन पर विस्तृत चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि बदलते समय में अपनी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक मूल्यों और परंपराओं को संरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने युवाओं को शिक्षा के प्रति जागरूक होने तथा नशापान जैसी सामाजिक बुराइयों से दूर रहने का संदेश दिया।

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इस दौरान सामाजिक एकता को सुदृढ़ बनाने, पारंपरिक संस्कारों के उचित निर्वहन तथा समाज के सर्वांगीण विकास के लिए सामूहिक प्रयास करने पर विशेष बल दिया गया। साथ ही समाज में आपसी सहयोग और जागरूकता बढ़ाने के लिए नियमित रूप से ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

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बैठक में मुखिया इंद्रजीत उरांव, पंचायत समिति सदस्य रीमा उरांव, सुमन मिंज, धर्मेंद्र उरांव, हिरू उरांव, वीरेंद्र उरांव, जयराम उरांव, धरनीसेन उरांव, देबू उरांव, गोविंद उरांव, मथुरा उरांव, हरेंद्र उरांव, भागीरथी उरांव, संतोष उरांव, कालीचरण उरांव, मुकुंद उरांव, कार्तिक उरांव, शालिग्राम उरांव, साधु उरांव तथा दशरथ उरांव सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।

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बैठक में बिटापुर, सोखानडीह, शहरबेड़ा, नारायणडीह, कदमबेड़ा, बाधडीह, मोसोडीह, तेतुलटांड़ और पदमपुर गांवों के ग्रामीणों ने भाग लिया तथा सामाजिक मुद्दों पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सामाजिक जागरूकता बढ़ाना, पारंपरिक संस्कृति का संरक्षण करना और समाज में एकजुटता को मजबूत करना था।

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विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: ‘सोना नहीं, पेड़ ही हमारी असली विरासत’ — आदिवासियत का प्रकृति संरक्षण संदेश

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: ‘सोना नहीं, पेड़ ही हमारी असली विरासत’ — आदिवासियत का प्रकृति संरक्षण संदेश

चाईबासा | एक ओर सोने और हीरों का ढेर है, तो दूसरी ओर लहलहाता हुआ हरा-भरा पेड़। दुनिया जिसे ‘दौलत’ कहती है, वह बंजर भूमि पर पड़ी चमकती वस्तुएँ हो सकती हैं, लेकिन आदिवासी समाज की दृष्टि में वास्तविक धन वह वृक्ष है, जिसकी जड़ों में संस्कृति और जिसकी शाखाओं में भविष्य सुरक्षित है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रकृति संरक्षण और आदिवासी जीवन-दर्शन पर केंद्रित यह संदेश आज के समय में और भी प्रासंगिक हो गया है। आदिवासी समाज सदियों से जल, जंगल और जमीन को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार और आस्था का केंद्र मानता आया है।

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प्रकृति ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी
आदिवासियत का मूल भाव प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीवन जीना है। आदिवासी समुदाय के लिए पेड़ केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि देवतुल्य संरक्षक और सांस्कृतिक विरासत हैं। आज जब विकास की अंधी दौड़ में कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं, तब स्वच्छ हवा, शीतल छाया और प्राकृतिक संतुलन का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।
सोना और हीरे भले ही आर्थिक समृद्धि के प्रतीक हों, लेकिन वे न तो ऑक्सीजन प्रदान कर सकते हैं और न ही भीषण गर्मी में छाया दे सकते हैं। इसी संदर्भ में एक प्रसिद्ध कथन याद आता है— “जब आखिरी पेड़ काट दिया जाएगा, आखिरी नदी प्रदूषित हो जाएगी और आखिरी मछली पकड़ ली जाएगी, तब इंसान को समझ आएगा कि वह पैसों को खा नहीं सकता।”

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इस वर्ष की थीम: प्रकृति से प्रेरित, भविष्य के लिए समर्पित
इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस की थीम “Inspired by Nature. For Climate. For Our Future” (प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।) रखी गई है। इसके साथ ही दुनिया भर में #NowForClimate अभियान चलाया जा रहा है।
यह थीम आदिवासी जीवन-दर्शन से पूरी तरह मेल खाती है। आदिवासी समाज सदैव प्रकृति को अपना गुरु मानता रहा है। जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती का समाधान प्रकृति के संरक्षण में ही निहित है। जंगल कार्बन अवशोषित करते हैं, नदियाँ जीवन देती हैं और पर्वत प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं।

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विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान और चरम मौसमीय घटनाओं के दौर में टिकाऊ जीवनशैली अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
जल, जंगल और जमीन से जुड़ा अस्तित्व
आदिवासी समाज का भूमि से रिश्ता केवल स्वामित्व का नहीं, बल्कि श्रद्धा और जिम्मेदारी का है। समुदाय यह भलीभांति समझता है कि जंगलों का अस्तित्व ही मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। वृक्ष ऑक्सीजन, फल, औषधियाँ और प्राकृतिक संतुलन प्रदान करते हैं, जो जीवन के लिए अनिवार्य हैं।

जलवायु संकट के दौर में आदिवासियत की प्रासंगिकता
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से जूझ रही है। ऐसे समय में आदिवासी संस्कृति का प्रकृति-केंद्रित जीवन-दर्शन एक महत्वपूर्ण समाधान प्रस्तुत करता है। यह समाज हमेशा आवश्यकता भर ही प्रकृति से लेने और उसके संरक्षण को प्राथमिकता देने की सीख देता रहा है।
आदिवासी मान्यता के अनुसार, सोना-चांदी और हीरे जीवन की वास्तविक जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते। कठिन परिस्थितियों में जीवन बचाने का आधार हरियाली, जल स्रोत और स्वच्छ वातावरण ही होते हैं। यही कारण है कि पर्यावरण दिवस हमें यह याद दिलाता है कि मनुष्य प्रकृति का मालिक नहीं, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा है।
आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली की विरासत
पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए समाज के बुद्धिजीवियों का कहना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो प्रकृति और मानव जीवन के बीच की दूरी बढ़ा दे। आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देने के लिए वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण समय की मांग है।
आदिवासी समाज का मानना है कि वास्तविक विरासत सोना-चांदी नहीं, बल्कि वे पेड़ हैं जिन्हें हम अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़कर जाते हैं।
“पेड़ लगाइए, जीवन बचाइए। क्योंकि प्रकृति है, तभी हम हैं।”

रांची: छऊ कला और नाट्य परंपरा पर विशेष व्याख्यान-प्रदर्शन आयोजित, गुरु तपन कुमार पटनायक ने साझा की कला की विरासत

रांची: छऊ कला और नाट्य परंपरा पर विशेष व्याख्यान-प्रदर्शन आयोजित, गुरु तपन कुमार पटनायक ने साझा की कला की विरासत

रांची | संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित “प्रातः स्मरण” कार्यक्रम के तहत रविवार को रांची स्थित ऑडिटोरियम सभागार में छऊ कला एवं नाट्य परंपरा पर विशेष व्याख्यान-प्रदर्शन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम पर्यटन, कला-संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग, झारखंड के सहयोग से आयोजित किया गया।

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कार्यक्रम में छऊ कला के वरिष्ठ गुरु एवं अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलाकार गुरु तपन कुमार पटनायक ने छऊ नृत्य की परंपरा, इतिहास, तकनीक और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने व्यावहारिक प्रदर्शन के माध्यम से छऊ नृत्य की विशिष्ट शारीरिक मुद्राओं, मुखौटों के महत्व और इसकी कलात्मक बारीकियों को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया।

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अपने संबोधन में गुरु पटनायक ने कहा कि छऊ केवल एक नृत्य शैली नहीं, बल्कि लोक जीवन, प्रकृति, आध्यात्मिकता और सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम है। उन्होंने महिषासुर वध, रामायण, महाभारत, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण तथा जन-जागरूकता जैसे विषयों पर आधारित छऊ प्रस्तुतियों का उल्लेख करते हुए इसकी सामाजिक प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

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कार्यक्रम में नाटक और लोक कला क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने भी अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन पर बल देते हुए नई पीढ़ी को लोक कलाओं से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
गुरु तपन कुमार पटनायक सरायकेला छऊ शैली के प्रमुख हस्ताक्षरों में गिने जाते हैं। छऊ कला के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वे विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं और योजनाओं के माध्यम से लोक कलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।
कार्यक्रम में कलाकारों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और कला प्रेमियों की बड़ी संख्या मौजूद रही। आयोजन का उद्देश्य भारतीय लोक एवं पारंपरिक कलाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उनके संरक्षण और संवर्धन को प्रोत्साहित करना था।

चड़क पूजा महोत्सव में भव्य छऊ नृत्य का आयोजन, प्रेम मार्डी ने की सराहना

चड़क पूजा महोत्सव में भव्य छऊ नृत्य का आयोजन, प्रेम मार्डी ने की सराहना

सरायकेला | सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया प्रखंड अंतर्गत रामजीवनपुर (बड़काटांड़) स्थित श्री-श्री सार्वजनिक शिव पूजा कमिटी द्वारा आयोजित चड़क पूजा महोत्सव के शुभ अवसर पर भव्य छऊ नृत्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं श्रद्धालु शामिल हुए। इस अवसर पर सरायकेला विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी प्रेम मार्डी भी उपस्थित रहे और आयोजन की सराहना की।

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कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रेम मार्डी ने कहा कि छऊ नृत्य केवल एक लोक कला नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान, परंपरा और गौरव का प्रतीक है। यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है तथा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।

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उन्होंने कहा कि इस प्रकार के सांस्कृतिक एवं धार्मिक आयोजन समाज में एकता, भाईचारे और सामाजिक समरसता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साथ ही, ये आयोजन लोगों में अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी कार्य करते हैं।

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प्रेम मार्डी ने रामजीवनपुर (बड़काटांड़) के ग्रामीणों, आयोजन समिति के सदस्यों एवं छऊ कलाकारों को सफल एवं भव्य आयोजन के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि क्षेत्रवासियों के निरंतर प्रयासों से स्थानीय सांस्कृतिक विरासत और अधिक सशक्त एवं समृद्ध हो रही है।
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने बुढ़ाबाबा से क्षेत्र में सुख, शांति, समृद्धि एवं खुशहाली बनाए रखने की प्रार्थना करते हुए सभी के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

चक्रधरपुर में श्रद्धा, उल्लास और भाईचारे के साथ मनाया गया बकरीद का पर्व

चक्रधरपुर में श्रद्धा, उल्लास और भाईचारे के साथ मनाया गया बकरीद का पर्व

चक्रधरपुर | चक्रधरपुर में गुरुवार को कुर्बानी का पर्व बकरीद श्रद्धा, उल्लास और आपसी भाईचारे के माहौल में मनाया गया। सुबह से ही शहर की विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की भारी भीड़ उमड़ी, जहां अकीदतमंदों ने विशेष नमाज अदा कर देश, राज्य और समाज में अमन-चैन, खुशहाली और तरक्की की दुआ मांगी।

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शहर की जामा मस्जिद, लोको मस्जिद, बंगला टॉड़ मस्जिद, दंदासाई नूरानी मस्जिद, मिल्लत कॉलोनी स्थित मस्जिदे बिलाल, पोटका मस्जिद समेत अन्य मस्जिदों में बड़ी संख्या में लोगों ने बकरीद की नमाज अदा की। नमाज के बाद लोगों ने एक-दूसरे से गले मिलकर बकरीद की मुबारकबाद दी और आपसी सौहार्द एवं भाईचारे का संदेश दिया।

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बकरीद के पर्व को शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न कराने के लिए प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। सभी प्रमुख मस्जिदों और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में एहतियातन पुलिस बल की तैनाती की गई थी। इस दौरान अंचलाधिकारी सुरेश कुमार सिन्हा, थाना प्रभारी अवधेश कुमार समेत पुलिस पदाधिकारी और जवान सुरक्षा व्यवस्था पर लगातार नजर बनाए हुए थे।

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बकरीद के अवसर पर पूरे शहर में धार्मिक आस्था और उत्साह का माहौल देखने को मिला। लोगों ने एक-दूसरे के घर पहुंचकर पर्व की शुभकामनाएं दीं और सामाजिक एकता तथा भाईचारे को मजबूत करने का संदेश दिया।

चाईबासा में स्वदेशी जागरण मंच का एकदिवसीय विचार वर्ग आयोजित, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर दिया जोर

चाईबासा में स्वदेशी जागरण मंच का एकदिवसीय विचार वर्ग आयोजित, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर दिया जोर

चाईबासा | शुक्रवार को स्वदेशी जागरण मंच की ओर से चाईबासा में एकदिवसीय विचार वर्ग का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में स्वदेशी जागरण मंच के क्षेत्रीय संगठन मंत्री अजय उपाध्याय तथा विभाग संयोजक राजकुमार शाह शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता संयोजक रामावतार राम रवि ने की। विचार वर्ग का शुभारंभ सामूहिक गीत और वंदे मातरम् के साथ हुआ।

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कार्यक्रम के दौरान विभाग संयोजक राजकुमार शाह ने संगठन की गतिविधियों और आगामी कार्यक्रमों की जानकारी कार्यकर्ताओं को दी। उन्होंने बताया कि आगामी 13 एवं 14 जून को गढ़वा में प्रांतीय विचार वर्ग का आयोजन किया जाएगा, जिसमें पश्चिम सिंहभूम जिले से लगभग 25 कार्यकर्ता भाग लेंगे।
विचार वर्ग को संबोधित करते हुए क्षेत्रीय संगठन मंत्री अजय उपाध्याय ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में समाज को पर्यावरण संरक्षण, जैविक खेती, ऊर्जा संरक्षण, लघु उद्योगों को बढ़ावा और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने जैसे विषयों के प्रति जागरूक करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इन विषयों पर अभियान चलाने से समाज में जागरूकता बढ़ेगी और देश के सर्वांगीण विकास को गति मिलेगी।

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अजय उपाध्याय ने कार्यकर्ताओं से स्वदेशी और विदेशी वस्तुओं की सूची तैयार कर जनजागरण अभियान चलाने तथा लोगों को स्वदेशी उत्पादों के उपयोग के लिए प्रेरित करने की अपील की। कार्यक्रम में उपस्थित सभी कार्यकर्ताओं ने सामूहिक रूप से स्वदेशी संकल्प लिया।
कार्यक्रम के अंत में कामेश्वर विश्वकर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया, जबकि रोहित मुंडा ने उपस्थित कार्यकर्ताओं को स्वदेशी संकल्प दिलाया।

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विचार वर्ग में जेकेएम राजू, प्रताप कटियार महतो, रितेश कुमार, पिंटू, अनूप प्रसाद, श्यामल दास, जयकिशन बिरूली, कुंदन कुमार, राजकिशोर साहू, जीवन प्रजापति, अशोक मोहंती, गौर चंद्रमुखी, अजय झा, संजय कर्मकार, जगदीश निषाद, दिलीप कुमार, रोहित दास और पप्पू राय सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

आदिवासी अस्तित्व और सांस्कृतिक पहचान पर हाथीसेरेंग में आम सभा, देशाउलि स्थल सौंदर्यकरण का निर्णय

आदिवासी अस्तित्व और सांस्कृतिक पहचान पर हाथीसेरेंग में आम सभा, देशाउलि स्थल सौंदर्यकरण का निर्णय

चाईबासा | पश्चिमी सिंहभूम जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत हेरमा पंचायत के हाथीसेरेंग गांव में आदिवासी अस्तित्व, सांस्कृतिक पहचान और विभिन्न सामाजिक विषयों को लेकर ग्रामीणों की एक आम सभा आयोजित की गई। सभा की अध्यक्षता बाजाय बानरा ने की, जिसमें “देशाऊली फाउंडेशन” के सदस्य एवं बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए।

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सभा में सर्वसम्मति से कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। तय किया गया कि आगामी 3 जून 2026 को श्रमदान के माध्यम से पवित्र देशाउलि स्थल का सौंदर्यकरण किया जाएगा। इसके लिए आसपास के गांवों और फाउंडेशन से जुड़े लोगों से भी श्रमदान में भागीदारी की अपील करने का निर्णय लिया गया।
बैठक में प्रत्येक परिवार से एक पोयला चावल और 50 रुपये आर्थिक सहयोग देने पर सहमति बनी। साथ ही देशाउलि स्थल पर शिलापट्ट स्थापित करने, स्थल के चारों ओर साल के पौधे लगाने तथा उसके सीमांकन कराने का भी निर्णय लिया गया। महिलाओं के देशाउलि स्थल में प्रवेश को लेकर भी सामूहिक स्तर पर चर्चा और निर्णय लिया गया।

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सभा के दौरान ग्रामीणों के बीच देशाउलि-जयरा स्थल और अन्य पवित्र स्थलों के धार्मिक एवं सामाजिक महत्व, दिऊरी की भूमिका तथा पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा हुई। इसके अलावा “देशाऊली फाउंडेशन” द्वारा संचालित सामाजिक कार्यों, कार्यक्रमों, गतिविधियों और वार्षिक उत्सव से संबंधित जानकारियां भी साझा की गईं।

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इस अवसर पर दिऊरी सेलाय पुरती, मुण्डा घनश्याम बानरा और मुण्डा सहयोगी बाजाय बानरा मुख्य रूप से उपस्थित रहे। वहीं फाउंडेशन की ओर से साधु हो’, पंकज बंकिरा, रविंद्र गिलुवा और गोविंद मुंदुईया समेत अन्य सदस्य और ग्रामीण मौजूद रहे।

सरायकेला सरस्वती शिशु मंदिर में अखिल भारतीय मंत्री ब्रह्म जी राव का दो दिवसीय प्रवास संपन्न

सरायकेला सरस्वती शिशु मंदिर में अखिल भारतीय मंत्री ब्रह्म जी राव का दो दिवसीय प्रवास संपन्न

सरायकेला | सरायकेला स्थित सरस्वती शिशु मंदिर उच्च विद्यालय में अखिल भारतीय मंत्री ब्रह्म जी राव तथा जमशेदपुर विभाग सह प्रमुख ब्रेन कुमार टुडू का दो दिवसीय प्रवास संपन्न हुआ। इस दौरान विद्यालय परिसर में विभिन्न शैक्षणिक एवं प्रेरणात्मक कार्यक्रम आयोजित किए गए।


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प्रवास के दौरान अतिथियों ने विद्यालय के आचार्य, आचार्याओं, संघ प्रतिनिधियों, प्राचार्य एवं उपप्रधानाचार्य के साथ महत्वपूर्ण बैठक कर शिक्षा, संगठन एवं संस्कारयुक्त वातावरण पर विस्तृत चर्चा की। साथ ही उन्होंने विद्यालय छात्रावास का भी भ्रमण किया तथा छात्रावास में निवासरत भैया-बहनों एवं आचार्यगण से संवाद स्थापित कर उनका मार्गदर्शन किया।

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15 मई को आयोजित विद्यालय की प्रातः वंदना सभा में अतिथियों की विशेष उपस्थिति रही। सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने विद्यार्थियों को राष्ट्र के प्रति समर्पण, अनुशासन एवं संस्कारयुक्त जीवन के महत्व से अवगत कराया। अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में उन्होंने झारखंड के अनेक वीर क्रांतिकारियों एवं राष्ट्रनायकों का उल्लेख करते हुए विद्यार्थियों में राष्ट्रभाव जागृत करने का संदेश दिया।

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विद्यालय के प्राचार्य पार्थ सारथी आचार्य ने उपस्थित विद्यार्थियों एवं आचार्य-दीदीजी के समक्ष अतिथियों का औपचारिक परिचय कराया। उन्होंने अतिथियों के प्रेरणादायी व्यक्तित्व एवं उनके सामाजिक एवं संगठनात्मक कार्यों पर भी प्रकाश डाला।
विद्यालय परिवार ने अतिथियों के इस प्रवास को अत्यंत प्रेरणास्पद, गौरवपूर्ण एवं स्मरणीय बताया। उनके मार्गदर्शन से विद्यार्थियों, आचार्यगण एवं विद्यालय परिवार में राष्ट्रसेवा तथा संस्कारयुक्त शिक्षा के प्रति नई ऊर्जा एवं उत्साह का संचार हुआ।

छऊ कला के संरक्षण और सरायकेला के विकास को लेकर मंत्री सुदिव्य सोनू से मिले मनोज चौधरी

छऊ कला के संरक्षण और सरायकेला के विकास को लेकर मंत्री सुदिव्य सोनू से मिले मनोज चौधरी

सरायकेला | सरायकेला की विश्वविख्यात छऊ कला के संरक्षण, कलाकारों के सम्मान और सांस्कृतिक विरासत के पुनर्जीवन को लेकर नगर पंचायत अध्यक्ष मनोज कुमार चौधरी ने झारखंड सरकार के कला, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू से शिष्टाचार मुलाकात कर विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की।

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इस दौरान उन्होंने विभागीय सचिव मुकेश कुमार तथा कला संस्कृति निदेशक आशिक अकरम से भी मुलाकात कर सरायकेला की सांस्कृतिक धरोहरों, कलाकारों की समस्याओं और विकास से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

नगर पंचायत अध्यक्ष मनोज कुमार चौधरी ने कहा कि सरायकेला की छऊ नृत्य कला केवल एक सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि पूरे झारखंड और देश की गौरवशाली पहचान है। उन्होंने कहा कि वर्षों से देश-विदेश में सम्मान प्राप्त करने वाली इस कला के संरक्षण और संवर्धन के लिए ठोस एवं दीर्घकालिक पहल की आवश्यकता है।

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मुलाकात के दौरान उन्होंने राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र के पुनर्जीवन एवं नियमित संचालन, छऊ नृत्य और वाद्य प्रशिक्षकों की नियुक्ति, स्थानीय कलाकारों के लिए सम्मानजनक पेंशन एवं प्रोत्साहन सुविधा उपलब्ध कराने, सरायकेला में बहुउद्देशीय कला भवन निर्माण तथा युवा पीढ़ी को पारंपरिक कलाओं से जोड़ने के लिए नियमित प्रशिक्षण एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के विस्तार की मांग उठाई।

मनोज कुमार चौधरी ने कहा कि सरायकेला की धरती ने देश को अनेक प्रतिष्ठित छऊ कलाकार दिए हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा और साधना से विश्व स्तर पर झारखंड का नाम रोशन किया है। ऐसे कलाकारों का सम्मान और उनका भविष्य सुरक्षित करना सरकार एवं समाज दोनों की जिम्मेदारी है।

इस अवसर पर नगर पंचायत अध्यक्ष ने मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू को सरायकेला की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक पारंपरिक छऊ मुखौटा और प्रसिद्ध सरायकेला लड्डू भेंट कर सम्मानित किया। मंत्री ने भी छऊ कला की महत्ता को स्वीकार करते हुए इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सकारात्मक पहल और आवश्यक सहयोग का आश्वासन दिया।

बैठक के दौरान नगर पंचायत क्षेत्र के समग्र विकास हेतु अतिरिक्त विशेष फंड उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई गई। मनोज कुमार चौधरी ने कहा कि ऐतिहासिक एवं जिला मुख्यालय होने के बावजूद सरायकेला आज भी कई आधारभूत समस्याओं से जूझ रहा है। पेयजल, सड़क, नाली, विद्युत व्यवस्था एवं शहरी आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार से विशेष सहयोग की आवश्यकता है।

इसके साथ ही उन्होंने सरायकेला क्षेत्र के प्रमुख ऐतिहासिक एवं धार्मिक पर्यटन स्थलों — श्री जगन्नाथ मंदिर, कुदरसाईं मंदिर एवं मिर्गी चिंगड़ा — के संरक्षण, सौंदर्यीकरण तथा पर्यटन मानचित्र में शामिल किए जाने की मांग भी सरकार के समक्ष रखी गई।