संस्कृति

बिरसा मुंडा जयंती: शहीद की विरासत और समाज का गिरता सच

बिरसा मुंडा जयंती: शहीद की विरासत और समाज का गिरता सच

बिरसा मुंडा की जयंती: शहीद की याद या सांस्कृतिक पतन का उत्सव ?

15 नवंबर, अमर शहीद बिरसा मुंडा की जयंती—जिसे आदिवासी इतिहास में एक गौरवपूर्ण दिवस माना जाता है। वही दिन आज समाज में कैसे और किस रूप में मनाया जा रहा है, इस पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सामाजिक चिंतक लक्ष्मीनारायण मुंडा ने अपने विस्तृत लेख में इस दिन को ‘सांस्कृतिक पतन का उत्सव’ बनाने की प्रवृत्ति पर तीखी आलोचना की है।
जहां एक युवा योद्धा ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके देशी दलालों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका। लेकिन अफसोस! आज यह दिन क्या बनकर रह गया है? एक बहाना – नाचने-गाने,शराब पीने, मांस भक्षण करने और फूहड़ आर्केस्ट्रा के नाम पर अश्लीलता फैलाने का आयोजन बन कर रह गया है। जहाँ संस्कृति के नाम पर द्विअर्थी गाने बजते हैं,अश्लील नृत्य होते हैं और लोग इतने मदमस्त हो जाते हैं कि उन्हें याद भी नही रहता कि किसके नाम पर यह सब हो रहा है। यह न सिर्फ बिरसा मुंडा की आत्मा का अपमान है, बल्कि पूरे आदिवासी संघर्ष की मिट्टी पलीद करने का घिनौना प्रयास है। हमारी पीढ़ी इतनी गिर चुकी है कि शहीदों की याद को भी बाजारु मनोरंजन में बदल देती है। मेरा यह आलेख इसी कटु सत्य की गहन पड़ताल करेगा, ताकि हम समझ सकें कि कैसे हमने अपने नायकों को भुला दिया है।

बिरसा मुंडा : एक योद्धा का जीवन और उलगुलान का विद्रोह।

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में एक मुंडा आदिवासी परिवार में हुआ था। वह कोई साधारण व्यक्ति नही थे। वह एक दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की लूट और उसके सहयोगी जमींदारों-महाजनों की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। 19वीं शताब्दी के अंत में आदिवासी इलाकों में ब्रिटिशों ने जमींदारी प्रथा थोप दी थी,जिसके तहत आदिवासियों की जमीनें छीन ली जाती थी,उन्हें बंधुआ मजदूर बना दिया जाता था और सूदखोर महाजन उनके खून-पसीने को चूसते थे। बिरसा ने इससे सहन नही किया। उन्होंने ‘उलगुलान’ – अर्थात ‘महान विद्रोह’ – की शुरुआत की,जो 1899-1900 में चला।
उलगुलान कोई साधारण विद्रोह नही था। यह ‘आबुआ राज’ (हमारा राज) का सपना था – जहाँ आदिवासी अपनी जमीन,अपनी संस्कृति और अपनी स्वतंत्रता पर अपना हक जताते थे। बिरसा ने आदिवासियों को एकजुट किया,उन्हें बताया कि ब्रिटिश और उनके दलाल कैसे उनकी जड़ें काट रहे हैं। उन्होंने धार्मिक-सांस्कृतिक आंदोलन भी चलाया, जहाँ ईसाई मिशनरियों के प्रभाव से बचाव और अपनी परंपराओं की रक्षा पर जोर दिया। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार किया और 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी मौत हो गई। संभवतः जहर देकर या यातनाओं से योजनाबद्ध षडयंत्र के तहत मार दिया गया। लेकिन उनका संदेश अमर रहा “अपनी जमीन बचाओ, शोषकों के खिलाफ लड़ो।” आज जब हम उनके इस संघर्ष को याद करते हैं, तो यह प्रेरणा का स्रोत होना चाहिए – न कि मदिरा पान और फूहड़ता में मदहोश।

आज की जयंती: शहीद की याद या बाजारु तमाशा ?

दुर्भाग्य से आज बिरसा मुंडा की जयंती पूरे देश में ‘धूमधाम’ से मनाई जा रही है – लेकिन किस तरह की धूमधाम? गांवों, शहरों और आदिवासी बाहुल्य इलाकों में कार्यक्रमों के नाम पर क्या हो रहा है ? नाच-गाना,डीजे पर तेज संगीत,शराब की बोतलें खुलना,मांस की दावतें और आर्केस्ट्रा जहाँ फूहड़ डांस होते हैं। संस्कृति के नाम पर द्विअर्थी गाने बजते हैं,अश्लील नृत्य होते हैं और युवा पीढ़ी इतनी मदहोश हो जाती है कि उन्हें पता भी नही चलता कि यह दिन किसके लिए है। क्या यही है बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि ? क्या उनका उलगुलान इसीलिए था कि हम उनकी याद में मदिरा पीकर नाचें और अपनी संस्कृति को अश्लीलता में डुबो दें?
यह कटु सत्य है कि हमारी समाज ने शहीदों को कमर्शियलाइज कर दिया है। राजनीतिक दल और स्थानीय नेता इस दिन को वोट बैंक की राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हैं – रैलियां निकालते हैं, भाषण देते हैं,लेकिन शाम होते ही सब कुछ पार्टी में बदल जाता है। आदिवासी इलाकों में जहाँ बिरसा ने जमीन के लिए लड़ाई लड़ी,आज भी शोषण जारी है – कॉर्पोरेट लूट,खनन कंपनियां और विकास के नाम पर विस्थापन इत्यादि। लेकिन जयंती पर कोई इन मुद्दों पर कोई बात नही करता है। इसके बजाय फूहड़ कार्यक्रम होते हैं जहाँ महिलाओं को ऑब्जेक्टिफाई किया जाता है और पुरुष मदिरा में डूबकर अपनी मर्दानगी दिखाते हैं। यह न सिर्फ बिरसा मुंडा का अपमान है,बल्कि पूरे आदिवासी समाज की गरिमा का मखौल है। हम इतने गिर चुके हैं कि शहीद की याद को भी ‘एन्जॉयमेंट’ में बदल देते हैं – जैसे कोई त्योहार हो, न कि संघर्ष की याद। क्या बिरसा मुंडा ने इसके लिए जान दी थी ? क्या उलगुलान का मतलब यही था – शराब और अश्लीलता ?
यह स्थिति और भी दुखद तब हो जाती है जब हम देखते हैं कि युवा पीढ़ी को बिरसा मुंडा के बारे में कुछ पता ही नही है। स्कूलों में उनके बारे में पढ़ाया जाता है,लेकिन वह किताबी ज्ञान बनकर रह जाता है। जयंती पर वे नाचते हैं,पीते हैं और अगले दिन भूल जाते हैं। यह सांस्कृतिक पतन है – जहाँ परंपराएं विकृत हो रही हैं और शहीदों की विरासत को बाजारु मनोरंजन में बेच दिया जा रहा है। अगर बिरसा आज जीवित होते, तो शायद वे फिर से उलगुलान का बिगुल फूंकते – इस बार अपने ही लोगों की अज्ञानता और पतन के खिलाफ।

बिरसा मुंडा के संदेश की आज की प्रासंगिकता।

बिरसा मुंडा का संघर्ष आज भी उतना ही समसामयिक है। आज आदिवासी इलाकों में क्या हो रहा है? विकास के नाम पर जंगलों की कटाई, खनन कंपनियों  की लूट,आदिवासियों की जमीनें छीन रही हैं और सरकारी नीतियां उन्हें मुख्यधारा से बाहर रख रही हैं। बिरसा ने ‘आबुआ राज’ का सपना देखा था – स्वशासन का, जहाँ आदिवासी अपनी किस्मत खुद लिखें। लेकिन आज हम क्या कर रहे हैं? उनकी जयंती पर मदिरा पीकर नाच रहे हैं, जबकि उनके बताए रास्ते पर चलने की बजाय हम शोषण को सहन कर रहे हैं।
उनका संदेश था – एकजुट होकर लड़ो, अपनी संस्कृति बचाओ। लेकिन आज संस्कृति के नाम पर क्या बच रहा है? फूहड़ डांस और अश्लील कार्यक्रम ? यह तो संस्कृति का विनाश है। बिरसा ने ब्रिटिश दलालों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन आज के दलाल – राजनीतिक नेता, एनजीओ और कॉर्पोरेट – उनके नाम पर पैसा कमा रहे हैं। जयंती पर अगर हम सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो उनके संघर्ष से प्रेरणा लें। आदिवासी अधिकारों के लिए आवाज उठाएं, जमीन बचाने के लिए लड़ें और सांस्कृतिक शुद्धता बनाए रखें। लेकिन अफसोस हमारी पीढ़ी इतनी कमजोर और स्वार्थी हो चुकी है कि शहीदों को भी ‘पार्टी’ में बदल देती है।
बिरसा मुंडा की जयंती कोई उत्सव नही, बल्कि चिंतन और संघर्ष का दिन होना चाहिए। हमें इस कटु सत्य को स्वीकार करना होगा कि हमने उनके बलिदान को भुला दिया है। नाच-गाना,शराब और फूहड़ता से हम उनकी आत्मा को और पीड़ा दे रहे हैं। सच्ची श्रद्धांजलि है – उनके इतिहास को पढ़ना, युवाओं को सिखाना और आज के शोषण के खिलाफ आवाज उठाना। अगर हम ऐसा नही करेंगे, तो बिरसा मुंडा जैसे नायक सिर्फ कैलेंडर की तारीख बनकर रह जाएंगे। आइए इस पतन को रोकें – वरना हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नही करेंगी। बिरसा मुंडा अमर रहें, लेकिन उनकी याद को अमर रखने की जिम्मेदारी हमारी है। जागो, वरना उलगुलान फिर से जरुरी हो जाएगा – इस बार खुद के खिलाफ !
आज बिरसा मुंडा के सपनों और उद्देश्यों के विरोधी हमारे अपने समाज के अंदर हैं।
इससे बदलना होगा।
यही वक्त की जरुरत है।

कुचाई के दलभंगा में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पारंपरिक तरीके से मनाई गई

कुचाई के दलभंगा में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पारंपरिक तरीके से मनाई गई

खरसावां : कुचाई प्रखंड के दलभंगा स्थित बिरसा चौक में सोमवार को बकास्त मुंडारी खुटकट्टी रक्षा एवं विकास समिति, 39 मौजा दलभंगा के तत्वावधान में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पारंपरिक तरीके से मनाई गई। समारोह में मुंडा–मानकियों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ जुलूस निकाला। साल वृक्ष की पूजा-अर्चना के बाद भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

इस मौके पर समिति के संस्थापकों—स्वर्गीय महिपति सिंह मुंडा, धन सिंह मुंडा, भगवत सिंह मुंडा, नोयल नाग, सहदेव सिंह मुंडा, गोपाल सिंह मुंडा और सीताराम सिंह मुंडा—के चित्रों पर भी माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी गई।

राज्य स्तरीय झारखंड खेल प्रतियोगिता में हाईजंप में स्वर्ण पदक जीतने वाली कुचाई की रीता सरदार और डिस्कस थ्रो में कांस्य पदक विजेता विजय दास के परिवारों को सम्मानित किया गया। विभिन्न गांवों के कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत कर कार्यक्रम में रंग भर दिए। साथ ही फुटबॉल प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया।

“आदिवासी एक कम्युनिटी है, उसका अपना चरित्र है” — गागराई

कार्यक्रम में पहुंचे खरसावां विधायक दशरथ गागराई ने कहा कि आदिवासी समुदाय की भाषा और संस्कृति का संरक्षण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम भगवान बिरसा मुंडा के आंदोलन की देन है और उनके आदर्शों को अपनाकर ही समाज का विकास संभव है।

समिति के अध्यक्ष मान सिंह मुंडा ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा ने आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए जनजागरण अभियान चलाया और अलग झारखंड राज्य की नींव रखी। समिति के सचिव लखीराम मुंडा ने कहा कि बिरसा मुंडा के आदर्शों पर चलते हुए राज्य के विकास का संघर्ष जारी रहेगा।

“शहीदों के सपनों को पूरा करना ही सच्ची श्रद्धांजलि” — मीरा मुंडा

कार्यक्रम में शामिल झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की पत्नी और भाजपा नेतृी मीरा मुंडा ने कहा कि झारखंड शहीदों के बलिदान से बना है। उनके सपनों को पूरा करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा का योगदान न सिर्फ झारखंड, बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास में दर्ज है।

कार्यक्रम में मौजूद रहे :-


विधायक दशरथ गागराई, बांसती गागराई, भाजपा नेतृी मीरा मुंडा, प्रमुख गुड्डी देवी, बीडीओ साधुचरण देवगम, विकास समिति के अध्यक्ष मान सिंह मुंडा, सचिव लखीराम मुंडा, मुखिया करम सिंह मुंडा, रेखामनी उरांव, मंगल सिंह मुंडा, पंसस वादमुनी मुंडा, सोनामनी मुंडा, उपमुखिया कौशल्या मुंडा, कांग्रेस जिलाध्यक्ष राज बागची, छोटराय किस्कू, इद्रजीत सिंह मुंडा, बहादुर सिंह मुंडा, फाकु मुंडा, दिनेश चन्द्र मुंडा, सुशील सिंह मुंडा, सुकनाथ मुंडा, मोहलाल मुंडा, जोगेन्द्र पहान, विदावंन सिंह मुंडा, मधुसूदन मुंडा, इस्टिफन मुंडा, दशरथ उरावं, धमेन्द्र साडिल, धमेन्द्र सिंह मुंड़ा, मुन्ना सोय, भरत सिंह मुंडा, लुबूराम सोयसहित अनेक मुंडा-मानकी और ग्रामीण उपस्थित थे।

नर्मदा में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर प्रधानमंत्री ने वंशजों को किया सम्मानित

नर्मदा में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर प्रधानमंत्री ने वंशजों को किया सम्मानित

गुजरात : गुजरात के नर्मदा में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। गुजरात सरकार के विशेष आमंत्रण पर धरती आबा के वंशज श्री बुधराम मुंडा और श्री रवि मुंडा उपस्थित रहे। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने दोनों अतिथियों को सम्मानित कर भगवान बिरसा मुंडा की महान विरासत को नमन किया।

चाईबासा में झारखंड स्थापना दिवस और बिरसा मुंडा जयंती पर भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित

चाईबासा में झारखंड स्थापना दिवस और बिरसा मुंडा जयंती पर भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित

चाईबासा : पश्चिम सिंहभूम जिला मुख्यालय चाईबासा के पिल्लई हॉल में झारखंड स्थापना दिवस और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर जिला स्तरीय सांस्कृतिक कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत मंत्री दीपक बिरुवा, प्रमंडलीय आयुक्त नेलसन एयोन बागे, जिला उपायुक्त चंदन कुमार और उप विकास आयुक्त संदीप कुमार मीणा सहित अन्य पदाधिकारियों ने दीप प्रज्वलन और भगवान बिरसा मुंडा के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की।

इस अवसर पर विभिन्न स्कूलों के बच्चों ने झारखंड स्थापना दिवस थीम पर गीत, नृत्य और नाटक प्रस्तुत किए, जिसे सभी अतिथियों और दर्शकों ने सराहा।

सांस्कृतिक प्रतियोगिता में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय चक्रधरपुर प्रथम, नेताजी सुभाष चंद्र बोस बालिका आवासीय विद्यालय चाईबासा द्वितीय और राज्यकृत बालिका उच्च विद्यालय चाईबासा तृतीय स्थान पर रहे।

तुरामडीह में यूसिल एसटी कर्मचारी संघ ने मनाई भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती

तुरामडीह में यूसिल एसटी कर्मचारी संघ ने मनाई भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती

जमशेदपुर : सुंदरनगर थाना अंतर्गत यूसिल तुरामडीह कॉलोनी में यूसिल अनुसूचित जनजाति कर्मचारी संघ, तुरामडीह इकाई की ओर से भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती न्यू सामुदायिक भवन, तुरामडीह में धूमधाम से मनाई गई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में संघ के महासचिव श्री दीपतेन्दु हांसदा उपस्थित थे।

इस अवसर पर बच्चों के लिए क्विज़ और ड्रॉइंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।


क्विज़ प्रतियोगिता

प्रथम: समृद्धि हांसदा

द्वितीय: चूड़ामनी सोरेन

तृतीय: निहारिका महतो


ड्रॉइंग प्रतियोगिता (जूनियर ग्रुप)

प्रथम: आयुष्मान हांसदा

द्वितीय: राजदीप हांसदा

तृतीय: नैना पूर्ति


ड्रॉइंग प्रतियोगिता (सीनियर ग्रुप)

प्रथम: श्रेया हांसदा

द्वितीय: प्रकाश हांसदा

तृतीय: गोपीनाथ हांसदा


कार्यक्रम को सफल बनाने में श्री सृजन टुडू, मंगल टुडू, मानिक चाँद मुर्मू, सुनील दिग्गी, लखन टुडू, कारा मुर्मू, दीपक हेमब्रोम, लखन मरडी, गोमा सरदार, गुरुचरण हांसदा, भरत लाल किस्कू, रिंचू मुर्मू और कारू मंडी का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

झारखंड स्थापना दिवस पर विकास मॉडल पर उठे सवाल, मूलवासियों के हितों की अनदेखी का आरोप

झारखंड स्थापना दिवस पर विकास मॉडल पर उठे सवाल, मूलवासियों के हितों की अनदेखी का आरोप

चाईबासा : झारखंड स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर कोल्हान जनशक्ति के अध्यक्ष सन्नी सामाद ने राज्य के विकास को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि अलग राज्य की मांग जिस उद्देश्य से की गई थी, वह आज भी अधूरा है।

सामाद ने सोशल मीडिया पर लिखा कि देश की 40% खनिज संपदा होने के बावजूद झारखंड शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी विकास के मोर्चे पर काफी पीछे है। उनका कहना है कि राज्य ‘लुटखंड’ बनकर रह गया है और सरकार के पास झारखंडी मूलवासियों के लिए कोई ठोस विकास मॉडल नहीं दिखता।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रोजगार के अभाव में पलायन बढ़ रहा है और बाहरी घुसपैठ राज्य की जनसांख्यिकी, संस्कृति एवं सभ्यता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।
ऐसे समय में उन्होंने सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाले व्यापक बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया।

चाईबासा में बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष समारोह आयोजित

चाईबासा में बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष समारोह आयोजित

चाईबासा : धरती आबा वीर बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और झारखंड स्थापना दिवस के रजत जयंती अवसर पर चाईबासा के गितिलपी चौक और कॉलेज मोड़ में कोल्हान शहीद स्मारक समिति की ओर से विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत ग्रामीण दिऊरि रमेश सवैंया ने आदि संस्कृति की पारंपरिक विधि-विधान के साथ पूजा कर की। इसके बाद सांस्कृतिक मंच पर स्थानीय कलाकारों ने रंगारंग प्रस्तुतियां दीं, जिससे माहौल उत्सवमय हो गया।

इस आयोजन का उद्देश्य वीर बिरसा मुंडा के योगदान को याद करना और 15 नवंबर 2000 से मनाए जा रहे झारखंड स्थापना दिवस के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करना था। कार्यक्रम को कोल्हान के उन आंदोलनकारियों की स्मृति में भी समर्पित किया गया, जिन्होंने अलग झारखंड राज्य की लड़ाई को मजबूत किया था।

कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के रूप में “नो एंट्री” आंदोलन के समर्थक और सामाजिक कार्यकर्ता साधु हो’ उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा इसी कोल्हान क्षेत्र से शुरू की थी, इसलिए यहां उनकी जयंती मनाना गर्व की बात है। उन्होंने युवाओं से कोल्हान की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की अपील की और घोषणा की कि आने वाले वर्षों में इस दिवस को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाने के प्रयास किए जाएंगे।

कार्यक्रम को सफल बनाने में समिति के अध्यक्ष सोना सवैंया, कृष्ण चंद्र सवैंया, दिनेश चंद्र सवैंया, अदम मुंदुईया, ललित सवैंया, बुदन सिंह सवैंया, रंजन मुंदुईया, कमल किशोर सिरका, सलेन मुंदुईया, सरस्वती मुंदुईया सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

उलिहातु में बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती एवं झारखंड स्थापना दिवस पर भव्य समारोह आयोजित

उलिहातु में बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती एवं झारखंड स्थापना दिवस पर भव्य समारोह आयोजित

खूंटी : धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और झारखंड स्थापना दिवस पर मंगलवार को खूंटी जिले के उलिहातु स्थित बिरसा मुंडा कॉम्प्लेक्स में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार, मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन और केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम शामिल हुए।

सभी अतिथियों ने बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया और उनके संघर्ष, जनसेवा तथा स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को याद किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, जनजातीय समुदाय के सदस्य और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने कहा कि बिरसा मुंडा जनजातीय अस्मिता के प्रतीक और देश की स्वतंत्रता व अधिकारों की लड़ाई के प्रेरक रहे हैं। वहीं केंद्रीय मंत्री जुएल ओराम ने जनजातीय समाज के विकास के लिए केंद्र सरकार की योजनाओं का उल्लेख किया।

जनजातीय गौरव दिवस और झारखंड राज्य के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर यह समारोह उत्साह और सम्मान के साथ संपन्न हुआ।

चक्रधरपुर में बिरसा मुंडा जयंती एवं जनजातीय गौरव दिवस मनाया गया

चक्रधरपुर में बिरसा मुंडा जयंती एवं जनजातीय गौरव दिवस मनाया गया

पश्चिमी सिंहभूम : चक्रधरपुर के पद्मावती जैन सरस्वती शिशु मंदिर, पंपरोड में शनिवार को भगवान बिरसा मुंडा जयंती एवं जनजातीय गौरव दिवस बड़े श्रद्धापूर्वक मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ उपाध्यक्ष श्रीमती दमयंती नाग, प्रधानाचार्य आनंद चन्द्र प्रधान, अध्यक्ष राकेश श्रीवास्तव और रेणुका प्रधान द्वारा दीप प्रज्ज्वलन और पुष्प अर्पित कर किया गया।

प्रधानाचार्य आनंद चन्द्र प्रधान ने अतिथियों का परिचय कराया और सभी को बिरसा मुंडा जयंती की शुभकामनाएँ दी। उन्होंने बिरसा मुंडा की जीवनी और उनके आदिवासी समाज में योगदान पर प्रकाश डाला। दमयंती नाग ने भी सभी को शुभकामनाएँ दी।

विद्यालय के छात्रों ने आदिवासी वेश-भूषा पहनकर लोक नृत्य प्रस्तुत किया, जबकि कुछ छात्र बिरसा मुंडा के रूप में तीर और धनुष के साथ कार्यक्रम को और भव्य बनाया। कई बच्चों ने बिरसा मुंडा की जीवनी पर हिंदी और अंग्रेजी में भाषण दिए।

कार्यक्रम का संचालन सौभिक घटक ने किया। जय श्री दास और शांति देवी ने भी बिरसा मुंडा की जीवनी और जनजातीय गौरव दिवस पर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम को सफल बनाने में जयश्री दास, शांति देवी, मीना कुमारी, सौभिक घटक, स्वास्तिक सोय, भारती कुमारी, चांदनी जोंको और जयंती तांती का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

बिरसा मुंडा भारतीय आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक थे – आनंद प्रधान

जगन्नाथपुर में बिरसा मुंडा जयंती और झारखंड स्थापना दिवस समारोह आयोजित

जगन्नाथपुर में बिरसा मुंडा जयंती और झारखंड स्थापना दिवस समारोह आयोजित

पश्चिमी सिंहभूम : जगन्नाथपुर के आयुर्वेदिक कॉलेज एवं अस्पताल परिसर में किसान विकास समिति, साननंदा द्वारा धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा जयंती एवं झारखंड राज्य के 25वें स्थापना दिवस का समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जगन्नाथपुर विधानसभा के लोकप्रिय विधायक एवं सत्तारूढ़ दल के उपमुख्य सचेतक श्री सोनाराम सिंकु जी उपस्थित रहे। साथ में जगन्नाथपुर प्रखण्ड अध्यक्ष ललित कुमार दोराईबुरू और नोवामुंडी प्रखण्ड अध्यक्ष मंजीत प्रधान भी शामिल हुए।

किसान विकास समिति के अध्यक्ष श्री रंजीत गागराई के नेतृत्व में विधायक का पारंपरिक ढोल-नगाड़ा बजाकर हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया गया। विधायक ने भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी और झारखंड आंदोलनकारियों को समर्पित किसान विकास समिति परिसर में बने झारखंड आंदोलनकारी पार्क का निरीक्षण किया। पार्क में आंदोलनकारी साथियों के नामों को देखकर उन्होंने झारखंड अलग राज्य बनने की कठिनाइयों और संघर्षों को याद किया।

कार्यक्रम में किसान विकास समिति के सलाहकार एवं ग्रामीण नेता स्व. कानुराम लागुरी को भी श्रद्धांजलि दी गई। उनके फोटो पर पुष्प अर्पित किए गए और दो मिनट का मौन रखा गया।

इस अवसर पर प्रखण्ड अध्यक्ष ललित कुमार दोराईबुरू, मंजीत प्रधान, अफताब आलम, मकरध्वज सरदार, सोमनाथ सिंकु, रंजन गोप, मथुरा लागुरी, मंजीत लागुरी, अजीत गागराई, सुशील लागुरी, विनीत कुमार लागुरी, सुदर्शन लागुरी, रमेश लागुरी, विशाल गोप, जग्गू केराई, बिशु केराई, किंगशन सिंकु, सनातन सिंकु, हरीश चन्द्र पान, सरफराज आलम, बबलु गोप, रंजीत गागराई, रोशन पान, संतोष मुंडा, मंगल सिंह लागुरी, मनोबोध लोहार, शमशाद आलम, जगदीश हेस्सा, गुरा सिंकु, मोटू गगराई, मनोज सिंकु, महेंद्र तांती सहित अन्य कांग्रेसी जन उपस्थित रहे।