चक्रधरपुर | पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर प्रखंड अंतर्गत बिंडासोर्जोम गांव की महिला किसान बलेमा सामड ने प्राकृतिक खेती अपनाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त कर उन्होंने अपने एक एकड़ खेत में प्राकृतिक खेती का मॉडल अपनाया। सीमित कृषि भूमि और खेती की बढ़ती लागत के बीच उन्होंने स्थानीय संसाधनों के उपयोग तथा फसल विविधीकरण के माध्यम से खेती की लागत को नियंत्रित करते हुए बेहतर आमदनी अर्जित की है। उनकी यह सफलता ग्रामीण क्षेत्र की अन्य महिला किसानों और छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन रही है।

रासायनिक खेती छोड़ प्राकृतिक खेती को अपनाया
प्राकृतिक खेती अपनाने से पहले बलेमा सामड को खेती के लिए बाजार से रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक खरीदने पड़ते थे। इससे प्रत्येक फसल चक्र में खेती की लागत बढ़ जाती थी और सीमित भूमि से होने वाली आमदनी का बड़ा हिस्सा कृषि कार्यों पर खर्च हो जाता था। ऐसे में बचत करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन से जुड़ने के बाद उन्हें प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और खेत में ही प्राकृतिक जैव-आदान तैयार करने की तकनीकों का प्रशिक्षण मिला। इसके बाद उन्होंने अपने एक एकड़ खेत में प्राकृतिक खेती का मॉडल लागू किया और बाजार से खरीदे जाने वाले रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम करते हुए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक सामग्रियों के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी।

स्थानीय संसाधनों से तैयार किए प्राकृतिक जैव-आदान
प्राकृतिक खेती के तहत बलेमा सामड ने बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र, अग्निअस्त्र, सुपर कम्पोस्ट और अंडा टॉनिक जैसी सामग्रियों का उपयोग किया। बीजामृत का इस्तेमाल बीज उपचार के लिए, जबकि जीवामृत और घनजीवामृत का उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया।
वहीं, सुपर कम्पोस्ट के माध्यम से मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने तथा नीमास्त्र और अग्निअस्त्र जैसे प्राकृतिक घोलों से कीट नियंत्रण के प्रयास किए गए। अंडा टॉनिक का उपयोग पौधों की वृद्धि और फलों की गुणवत्ता बेहतर बनाने के उद्देश्य से किया गया। इन उपायों से खेती में बाजार से खरीदे जाने वाले रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम करने और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग का अवसर मिला।

फसल विविधीकरण से उत्पादन और आमदनी में बढ़ोतरी
बलेमा सामड ने एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय अपने खेत में करेला, बरबटी, झींगा, नेनुआ और मक्का जैसी विभिन्न फसलों की खेती की। उन्होंने जून 2026 में फसलों की बुवाई की। नियमित देखभाल, प्राकृतिक जैव-आदानों के उपयोग और समय पर तुड़ाई के जरिए सब्जियों की कुल 18 बार व्यावसायिक तुड़ाई की गई।
अलग-अलग फसलों की खेती से खेत का बेहतर उपयोग हुआ और बाजार में विभिन्न प्रकार की उपज बेचकर आमदनी अर्जित करने का अवसर मिला। फसल विविधीकरण से एक ही फसल पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिली। इस प्रकार प्राकृतिक खेती और फसल विविधीकरण के समन्वय से उन्होंने सीमित कृषि भूमि से बेहतर आर्थिक परिणाम हासिल किए।

₹12 हजार की लागत में ₹65 हजार की सकल आय
बलेमा सामड की सफलता का प्रमुख पहलू खेती की लागत पर नियंत्रण और उससे प्राप्त आय का संतुलन है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक एकड़ खेत में प्राकृतिक खेती से उन्हें लगभग 1,800 किलोग्राम कुल उत्पादन प्राप्त हुआ। खेती पर कुल ₹12,000 की लागत आई।
मुख्य फसलों से ₹55,000 और सह-फसलों से ₹10,000 की आय हुई। इस तरह उनकी कुल सकल आय ₹65,000 रही। खेती की कुल लागत घटाने के बाद उन्हें ₹53,000 का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।
यह उपलब्धि दर्शाती है कि उचित कृषि प्रबंधन, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और फसल विविधीकरण के माध्यम से छोटे एवं सीमांत किसान भी अपनी खेती को अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण पर जोर
प्राकृतिक खेती का लाभ केवल आमदनी बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इस पद्धति में स्थानीय संसाधनों से तैयार जैव-आदानों का उपयोग कर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जाता है। जीवामृत, घनजीवामृत और सुपर कम्पोस्ट जैसी सामग्रियों का उचित उपयोग मिट्टी की जैविक गुणवत्ता सुधारने में सहायक हो सकता है। वहीं, प्राकृतिक कीट नियंत्रण के उपाय रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल को कम करने में मदद कर सकते हैं।
बलेमा सामड की पहल आजीविका को मजबूत बनाने, मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर रखने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उनके खेत में उत्पादित विभिन्न प्रकार की सब्जियां परिवार के भोजन में विविधता लाने में भी सहायक हैं।
किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रयासरत जिला प्रशासन : मनीष कुमार
पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त मनीष कुमार ने कहा कि प्राकृतिक खेती किसानों की लागत कम करने, स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और आमदनी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। बलेमा सामड जैसी महिला किसानों की सफलता ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए प्रेरणादायक है।उन्होंने कहा कि किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए जिला प्रशासन निरंतर प्रयासरत है। प्राकृतिक खेती और फसल विविधीकरण अपनाकर किसान अपनी आजीविका को और मजबूत बना सकते हैं।

कम खर्च में बेहतर खेती करने की मिली नई राह : बलेमा सामड
महिला किसान बलेमा सामड ने बताया कि पहले खेती में खाद और कीटनाशक खरीदने पर काफी खर्च करना पड़ता था। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत प्रशिक्षण मिलने के बाद उन्होंने अपने खेत में प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाया। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों से प्राकृतिक खाद तैयार की और कीट नियंत्रण के उपायों का इस्तेमाल किया।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग सब्जियों की खेती और कई बार तुड़ाई से अच्छी आमदनी अर्जित करने का अवसर मिला है। प्राकृतिक खेती ने उन्हें कम खर्च में बेहतर ढंग से खेती करने की नई राह दिखाई है। उन्होंने अन्य किसानों से भी प्राकृतिक खेती की तकनीकों को सीखने और अपनाने की अपील की।
अन्य किसानों के लिए बनीं प्रेरणास्रोत
बलेमा सामड की सफलता यह संदेश देती है कि खेती को लाभकारी बनाने के लिए केवल अधिक भूमि या महंगे कृषि संसाधनों की आवश्यकता नहीं है। उचित प्रशिक्षण, स्थानीय संसाधनों का उपयोग, फसल विविधीकरण और नियमित देखभाल के जरिए छोटे एवं सीमांत किसान भी अपनी आय बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत प्राप्त प्रशिक्षण को अपने खेत में लागू कर बलेमा सामड ने खेती की लागत नियंत्रित करने और आमदनी बढ़ाने का उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनकी उपलब्धि ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।



















































