बिरसा मुंडा की जयंती: शहीद की याद या सांस्कृतिक पतन का उत्सव ?
15 नवंबर, अमर शहीद बिरसा मुंडा की जयंती—जिसे आदिवासी इतिहास में एक गौरवपूर्ण दिवस माना जाता है। वही दिन आज समाज में कैसे और किस रूप में मनाया जा रहा है, इस पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सामाजिक चिंतक लक्ष्मीनारायण मुंडा ने अपने विस्तृत लेख में इस दिन को ‘सांस्कृतिक पतन का उत्सव’ बनाने की प्रवृत्ति पर तीखी आलोचना की है।
जहां एक युवा योद्धा ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके देशी दलालों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका। लेकिन अफसोस! आज यह दिन क्या बनकर रह गया है? एक बहाना – नाचने-गाने,शराब पीने, मांस भक्षण करने और फूहड़ आर्केस्ट्रा के नाम पर अश्लीलता फैलाने का आयोजन बन कर रह गया है। जहाँ संस्कृति के नाम पर द्विअर्थी गाने बजते हैं,अश्लील नृत्य होते हैं और लोग इतने मदमस्त हो जाते हैं कि उन्हें याद भी नही रहता कि किसके नाम पर यह सब हो रहा है। यह न सिर्फ बिरसा मुंडा की आत्मा का अपमान है, बल्कि पूरे आदिवासी संघर्ष की मिट्टी पलीद करने का घिनौना प्रयास है। हमारी पीढ़ी इतनी गिर चुकी है कि शहीदों की याद को भी बाजारु मनोरंजन में बदल देती है। मेरा यह आलेख इसी कटु सत्य की गहन पड़ताल करेगा, ताकि हम समझ सकें कि कैसे हमने अपने नायकों को भुला दिया है।
बिरसा मुंडा : एक योद्धा का जीवन और उलगुलान का विद्रोह।
बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में एक मुंडा आदिवासी परिवार में हुआ था। वह कोई साधारण व्यक्ति नही थे। वह एक दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की लूट और उसके सहयोगी जमींदारों-महाजनों की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। 19वीं शताब्दी के अंत में आदिवासी इलाकों में ब्रिटिशों ने जमींदारी प्रथा थोप दी थी,जिसके तहत आदिवासियों की जमीनें छीन ली जाती थी,उन्हें बंधुआ मजदूर बना दिया जाता था और सूदखोर महाजन उनके खून-पसीने को चूसते थे। बिरसा ने इससे सहन नही किया। उन्होंने ‘उलगुलान’ – अर्थात ‘महान विद्रोह’ – की शुरुआत की,जो 1899-1900 में चला।
उलगुलान कोई साधारण विद्रोह नही था। यह ‘आबुआ राज’ (हमारा राज) का सपना था – जहाँ आदिवासी अपनी जमीन,अपनी संस्कृति और अपनी स्वतंत्रता पर अपना हक जताते थे। बिरसा ने आदिवासियों को एकजुट किया,उन्हें बताया कि ब्रिटिश और उनके दलाल कैसे उनकी जड़ें काट रहे हैं। उन्होंने धार्मिक-सांस्कृतिक आंदोलन भी चलाया, जहाँ ईसाई मिशनरियों के प्रभाव से बचाव और अपनी परंपराओं की रक्षा पर जोर दिया। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार किया और 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी मौत हो गई। संभवतः जहर देकर या यातनाओं से योजनाबद्ध षडयंत्र के तहत मार दिया गया। लेकिन उनका संदेश अमर रहा “अपनी जमीन बचाओ, शोषकों के खिलाफ लड़ो।” आज जब हम उनके इस संघर्ष को याद करते हैं, तो यह प्रेरणा का स्रोत होना चाहिए – न कि मदिरा पान और फूहड़ता में मदहोश।
आज की जयंती: शहीद की याद या बाजारु तमाशा ?
दुर्भाग्य से आज बिरसा मुंडा की जयंती पूरे देश में ‘धूमधाम’ से मनाई जा रही है – लेकिन किस तरह की धूमधाम? गांवों, शहरों और आदिवासी बाहुल्य इलाकों में कार्यक्रमों के नाम पर क्या हो रहा है ? नाच-गाना,डीजे पर तेज संगीत,शराब की बोतलें खुलना,मांस की दावतें और आर्केस्ट्रा जहाँ फूहड़ डांस होते हैं। संस्कृति के नाम पर द्विअर्थी गाने बजते हैं,अश्लील नृत्य होते हैं और युवा पीढ़ी इतनी मदहोश हो जाती है कि उन्हें पता भी नही चलता कि यह दिन किसके लिए है। क्या यही है बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि ? क्या उनका उलगुलान इसीलिए था कि हम उनकी याद में मदिरा पीकर नाचें और अपनी संस्कृति को अश्लीलता में डुबो दें?
यह कटु सत्य है कि हमारी समाज ने शहीदों को कमर्शियलाइज कर दिया है। राजनीतिक दल और स्थानीय नेता इस दिन को वोट बैंक की राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हैं – रैलियां निकालते हैं, भाषण देते हैं,लेकिन शाम होते ही सब कुछ पार्टी में बदल जाता है। आदिवासी इलाकों में जहाँ बिरसा ने जमीन के लिए लड़ाई लड़ी,आज भी शोषण जारी है – कॉर्पोरेट लूट,खनन कंपनियां और विकास के नाम पर विस्थापन इत्यादि। लेकिन जयंती पर कोई इन मुद्दों पर कोई बात नही करता है। इसके बजाय फूहड़ कार्यक्रम होते हैं जहाँ महिलाओं को ऑब्जेक्टिफाई किया जाता है और पुरुष मदिरा में डूबकर अपनी मर्दानगी दिखाते हैं। यह न सिर्फ बिरसा मुंडा का अपमान है,बल्कि पूरे आदिवासी समाज की गरिमा का मखौल है। हम इतने गिर चुके हैं कि शहीद की याद को भी ‘एन्जॉयमेंट’ में बदल देते हैं – जैसे कोई त्योहार हो, न कि संघर्ष की याद। क्या बिरसा मुंडा ने इसके लिए जान दी थी ? क्या उलगुलान का मतलब यही था – शराब और अश्लीलता ?
यह स्थिति और भी दुखद तब हो जाती है जब हम देखते हैं कि युवा पीढ़ी को बिरसा मुंडा के बारे में कुछ पता ही नही है। स्कूलों में उनके बारे में पढ़ाया जाता है,लेकिन वह किताबी ज्ञान बनकर रह जाता है। जयंती पर वे नाचते हैं,पीते हैं और अगले दिन भूल जाते हैं। यह सांस्कृतिक पतन है – जहाँ परंपराएं विकृत हो रही हैं और शहीदों की विरासत को बाजारु मनोरंजन में बेच दिया जा रहा है। अगर बिरसा आज जीवित होते, तो शायद वे फिर से उलगुलान का बिगुल फूंकते – इस बार अपने ही लोगों की अज्ञानता और पतन के खिलाफ।
बिरसा मुंडा के संदेश की आज की प्रासंगिकता।
बिरसा मुंडा का संघर्ष आज भी उतना ही समसामयिक है। आज आदिवासी इलाकों में क्या हो रहा है? विकास के नाम पर जंगलों की कटाई, खनन कंपनियों की लूट,आदिवासियों की जमीनें छीन रही हैं और सरकारी नीतियां उन्हें मुख्यधारा से बाहर रख रही हैं। बिरसा ने ‘आबुआ राज’ का सपना देखा था – स्वशासन का, जहाँ आदिवासी अपनी किस्मत खुद लिखें। लेकिन आज हम क्या कर रहे हैं? उनकी जयंती पर मदिरा पीकर नाच रहे हैं, जबकि उनके बताए रास्ते पर चलने की बजाय हम शोषण को सहन कर रहे हैं।
उनका संदेश था – एकजुट होकर लड़ो, अपनी संस्कृति बचाओ। लेकिन आज संस्कृति के नाम पर क्या बच रहा है? फूहड़ डांस और अश्लील कार्यक्रम ? यह तो संस्कृति का विनाश है। बिरसा ने ब्रिटिश दलालों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन आज के दलाल – राजनीतिक नेता, एनजीओ और कॉर्पोरेट – उनके नाम पर पैसा कमा रहे हैं। जयंती पर अगर हम सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो उनके संघर्ष से प्रेरणा लें। आदिवासी अधिकारों के लिए आवाज उठाएं, जमीन बचाने के लिए लड़ें और सांस्कृतिक शुद्धता बनाए रखें। लेकिन अफसोस हमारी पीढ़ी इतनी कमजोर और स्वार्थी हो चुकी है कि शहीदों को भी ‘पार्टी’ में बदल देती है।
बिरसा मुंडा की जयंती कोई उत्सव नही, बल्कि चिंतन और संघर्ष का दिन होना चाहिए। हमें इस कटु सत्य को स्वीकार करना होगा कि हमने उनके बलिदान को भुला दिया है। नाच-गाना,शराब और फूहड़ता से हम उनकी आत्मा को और पीड़ा दे रहे हैं। सच्ची श्रद्धांजलि है – उनके इतिहास को पढ़ना, युवाओं को सिखाना और आज के शोषण के खिलाफ आवाज उठाना। अगर हम ऐसा नही करेंगे, तो बिरसा मुंडा जैसे नायक सिर्फ कैलेंडर की तारीख बनकर रह जाएंगे। आइए इस पतन को रोकें – वरना हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नही करेंगी। बिरसा मुंडा अमर रहें, लेकिन उनकी याद को अमर रखने की जिम्मेदारी हमारी है। जागो, वरना उलगुलान फिर से जरुरी हो जाएगा – इस बार खुद के खिलाफ !
आज बिरसा मुंडा के सपनों और उद्देश्यों के विरोधी हमारे अपने समाज के अंदर हैं।
इससे बदलना होगा।
यही वक्त की जरुरत है।