चक्रधरपुर | हो भाषा की वारंग क्षिति लिपि के जनक, महान भाषाविद एवं समाज सुधारक ओत गुरु कोल लको बोदरा की 40वीं पुण्यतिथि सोमवार को आदिवासी मित्र मंडल, पोटका (चक्रधरपुर) स्थित उनके स्मृति स्मारक “बिड दिरी” स्थल पर श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई।

इस अवसर पर आदिवासी हो समाज महासभा, चक्रधरपुर एवं आदिवासी मित्र मंडल, पोटका के संयुक्त तत्वावधान में श्रद्धांजलि सभा तथा पारंपरिक बोंगा-बुरू पूजा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 8:00 बजे ओत गुरु बोदरा के स्मृति शिलापट्ट पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया।

ओत गुरु का योगदान
ओत गुरु कोल लको बोदरा का जन्म 19 सितंबर 1919 को हुआ था। उन्होंने हो आदिवासी समुदाय को उसकी अपनी लिपि वारंग क्षिति प्रदान कर भाषा, शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण में ऐतिहासिक योगदान दिया।

उनकी इस उपलब्धि ने हो समाज की अस्मिता और पहचान को नई दिशा दी। 29 जून 1986 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार और योगदान आज भी समाज को प्रेरित कर रहे हैं।

वक्ताओं ने किया उनके योगदान का स्मरण
श्रद्धांजलि सभा की अध्यक्षता हो समाज महासभा के अध्यक्ष श्रीराम समड ने की। उन्होंने कहा कि ओत गुरु बोदरा ने समाज को केवल एक लिपि ही नहीं दी, बल्कि स्वाभिमान और आत्मसम्मान के साथ जीने का मार्ग भी दिखाया। उन्होंने कहा कि वारंग क्षिति लिपि हो समाज की पहचान है और नई पीढ़ी को इसे सीखकर आगे बढ़ाना चाहिए।

मथुरा गागराई ने कहा कि ओत गुरु ने विपरीत परिस्थितियों में भी समाज को शिक्षित और संगठित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। वहीं नितिमा जोंको ने महिलाओं से वारंग क्षिति लिपि सीखने तथा अपने बच्चों को भी इसे सिखाने का आह्वान किया।
पारंपरिक रीति-रिवाज से हुई पूजा

श्रद्धांजलि सभा के उपरांत पारंपरिक रीति-रिवाज बोंगा-बुरू के तहत पूजा-अर्चना की गई। समाज के दिउरी ने ओत गुरु की आत्मा की शांति तथा समाज की उन्नति और समृद्धि के लिए प्रार्थना की। उपस्थित लोगों ने बिड दिरी पर तेल, फूल एवं सुड़िता अर्पित कर श्रद्धासुमन अर्पित किए।

बड़ी संख्या में लोग रहे उपस्थित
कार्यक्रम में मथुरा गागराई, नितिमा जोंको, दोराई हसदा, सुखराज सोरेन, मोगो केराई, मंगता पूर्ति, कालिया जमुदा, मोती सोय, अनीता गागराई, सुनील बोदरा, विश्वनाथ लामय, गीता जोजो, सुमित्रा जोंको, परमेश बोदरा सहित बड़ी संख्या में महिला-पुरुष, युवा एवं बुजुर्ग उपस्थित रहे।

