सरायकेला खरसावां | सरायकेला राजमहल में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने कहा कि सरायकेला की छऊ केवल एक नृत्य कला नहीं है, बल्कि यह यहां की पहचान, धार्मिक आस्था और आध्यात्म से भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने बताया कि हर वर्ष अप्रैल महीने में चैत्र पर्व के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान के साथ इस पर्व को मनाया जाता है।

उन्होंने कहा कि पहले की तरह चैत्र पर्व को एक दिवसीय कार्यक्रम के रूप में मनाया जाना चाहिए, जबकि जिला स्थापना दिवस 30 अप्रैल को महोत्सव के रूप में आयोजित किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि विश्व प्रसिद्ध छऊ नृत्य की ख्याति देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक फैली हुई है।
राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने कहा कि छऊ नृत्य यहां की धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है, इसलिए आस्था का सम्मान करते हुए इस कला को और अधिक विकसित व संरक्षित किया जाना चाहिए।

उन्होंने जानकारी दी कि चैत्र पर्व के आयोजन को लेकर शुक्रवार को सदर एसडीओ की अध्यक्षता में एक बैठक हुई थी। बैठक में 29 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय डांस डे के अवसर पर छऊ महोत्सव आयोजित करने का सुझाव दिया गया है। वहीं 13 अप्रैल को केवल छऊ नृत्य कार्यक्रम और चैत्र पर्व मनाने का प्रस्ताव एसडीओ को दिया गया है, ताकि यहां की संस्कृति और परंपरा सुरक्षित रह सके।
उन्होंने कहा कि बिहार सरकार के समय से ही चैत्र पर्व मनाया जाता रहा है, लेकिन झारखंड राज्य बनने के बाद इसमें बदलाव कर इसे महोत्सव का रूप दे दिया गया। कई बार ऐसा भी हुआ कि छऊ नृत्य की जगह अन्य राज्यों के नृत्य कार्यक्रमों को ज्यादा महत्व दिया गया।
उन्होंने कहा कि चैत्र पर्व स्थानीय धार्मिक परंपरा और पूजा-पाठ से जुड़ा हुआ है, इसलिए महोत्सव के नाम पर इससे छेड़छाड़ करना उचित नहीं है। अगर जिला प्रशासन इस प्रस्ताव से सहमत नहीं होता है, तो राजमहल में अलग से विधिवत चैत्र महोत्सव का आयोजन किया जाएगा, जिसमें स्थानीय कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे।

