चाईबासा | कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के हो विभाग की ओर से शनिवार को विश्वविद्यालय सभागार में महान हो भाषा एवं साहित्यकार ओत गुरु लाको बोदरा की जयंती सह साहित्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य लाको बोदरा के भाषा, साहित्य एवं सांस्कृतिक योगदान को स्मरण करना तथा युवा पीढ़ी को उनके कार्यों और विचारों से परिचित कराना था।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं लाको बोदरा के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ। विभाग की ओर से डॉ. बसंत चाकी ने अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र एवं पौधा भेंट कर किया।
समारोह में हो साहित्यकार एवं समाजसेवी सोनू हेस्सा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि आदिवासी हो समाज महासभा के उपाध्यक्ष नरेश देवगम विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में मानविकी संकाय के संकायाध्यक्ष सह जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कुमार पीयूष, ओड़िया विभागाध्यक्ष डॉ. विधु भूषण भुईया, संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. निवारण महथा, अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. सरोज कैवर्त, गणित विभागाध्यक्ष डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता, वनस्पति विभागाध्यक्ष डॉ. दारा सिंह सहित अन्य शिक्षक उपस्थित रहे।

विद्यार्थियों ने प्रस्तुत किए गीत, कविता और सांस्कृतिक कार्यक्रम
साहित्य संगोष्ठी के दौरान विद्यार्थियों ने लाको बोदरा के जीवन, भाषा एवं साहित्यिक योगदान पर अपने विचार और भाषण प्रस्तुत किए। इसके बाद हो गीत, संगीत, कविता तथा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी गई। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से हो समाज की समृद्ध भाषा, संस्कृति एवं परंपराओं की झलक देखने को मिली।
मुख्य अतिथि सोनू हेस्सा ने विद्यार्थियों को गीत, कविता एवं कहानी के माध्यम से साहित्य के क्षेत्र में योगदान देने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने साहित्य सृजन के महत्व पर विशेष जोर दिया।

विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कुमार पीयूष ने कहा कि विद्यार्थियों के लिए अपनी कला एवं संस्कृति से जुड़े रहना आवश्यक है। इसके साथ ही उन्हें अपनी पढ़ाई पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि नरेश देवगम ने हो भाषा के महत्व पर अपने विचार रखे। उन्होंने लाको बोदरा को ‘ओत गुरु’ की उपाधि दिए जाने से जुड़ी जानकारी साझा की तथा हो व्याकरण के महत्व पर भी प्रकाश डाला।

डॉ. बसंत चाकी ने कहा कि लाको बोदरा का जीवन हो समाज के उत्थान तथा भाषा-संस्कृति के विकास के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में वैज्ञानिक सोच और तकनीक के माध्यम से समाज के विकास की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

डॉ. सुभाष चंद्र महतो ने लाको बोदरा के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने हो भाषा और उसकी पहचान को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। वहीं दानगी सोरेन ने कहा कि लाको बोदरा जयंती केवल उनके स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति और साहित्य से जोड़ने का माध्यम भी है।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. बसंत चाकी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। समारोह में शिक्षण सहायक मादे कोड़ा, गोरंगो मुर्मू, बाल किशोर महतो, पूर्व शिक्षण सहायक गोनो अल्डा, रामदेव बोयपाई, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन अतिथियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करने के बाद सामूहिक राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान के साथ हुआ।

