आनंदपुर | पश्चिमी सिंहभूम जिले के आनंदपुर प्रखंड के बदिया गांव की सरस्वती कुजूर ग्रामीण महिला सशक्तीकरण और आत्मनिर्भरता की प्रेरणादायक मिसाल बनकर उभरी हैं। कभी पति की अनियमित आय और हड़िया बिक्री पर निर्भर परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने वाली सरस्वती आज पोल्ट्री और पिगरी व्यवसाय के माध्यम से नियमित आमदनी अर्जित कर रही हैं।

परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं था। इसी दौरान सरस्वती झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) के अंतर्गत स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह के माध्यम से उन्हें बचत, वित्तीय सहयोग, आजीविका संबंधी प्रशिक्षण और स्वरोजगार के अवसरों की जानकारी मिली। इस सहयोग ने उन्हें पारंपरिक आजीविका से आगे बढ़कर अपना व्यवसाय शुरू करने का आत्मविश्वास दिया।

35 हजार रुपये के निवेश से शुरू किया पोल्ट्री व्यवसाय
सरस्वती ने करीब 35 हजार रुपये के प्रारंभिक निवेश से लगभग 200 चूजों के साथ पोल्ट्री पालन शुरू किया। शुरुआत में चूजों की देखभाल, आहार, टीकाकरण, बीमारी से बचाव और बाजार में बिक्री जैसी कई चुनौतियां सामने आईं। जेएसएलपीएस और स्वयं सहायता समूह से मिले प्रशिक्षण के माध्यम से उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से पोल्ट्री पालन करना सीखा और व्यवसाय को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया।

पोल्ट्री व्यवसाय से होने वाली आमदनी ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। आय के अतिरिक्त स्रोत के रूप में उन्होंने घर के स्तर पर सुअर पालन भी शुरू किया। इस तरह उन्होंने परिवार के लिए आय के एक से अधिक साधन विकसित किए।
नियमित आमदनी से मजबूत हो रही परिवार की आर्थिक स्थिति
वर्तमान में सरस्वती पोल्ट्री व्यवसाय से करीब 500 रुपये प्रतिदिन की आय अर्जित कर रही हैं। इससे उनकी अनुमानित मासिक आय 15 से 20 हजार रुपये तक पहुंच गई है। नियमित आमदनी से अब वह परिवार की दैनिक जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा कर पा रही हैं। आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है।

सरस्वती की सफलता बताती है कि छोटे स्तर से शुरू किया गया व्यवसाय भी उचित प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और निरंतर मेहनत के माध्यम से स्थायी आजीविका का साधन बन सकता है। उनकी सफलता गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन रही है।
उपायुक्त ने सरस्वती की सफलता को बताया प्रेरणादायक
पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त मनीष कुमार ने सरस्वती कुजूर की सफलता को ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण का प्रेरणादायक उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग और आजीविका के अवसरों से जोड़ने का उद्देश्य उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है।

उपायुक्त ने कहा कि सरस्वती की सफलता दर्शाती है कि सही अवसर और मार्गदर्शन मिलने पर ग्रामीण महिलाएं छोटे उद्यमों को सफल व्यवसाय में बदल सकती हैं। महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता से न केवल परिवार की आय मजबूत होती है, बल्कि पूरे समुदाय में भी सकारात्मक बदलाव आता है।
उन्होंने स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं से उपलब्ध प्रशिक्षण और आजीविका योजनाओं का लाभ उठाकर स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया।

हड़िया बिक्री और परिवार की अनियमित आय से शुरू हुआ सरस्वती कुजूर का सफर आज पोल्ट्री और पिगरी उद्यम के जरिए आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। करीब 35 हजार रुपये के निवेश से शुरू हुआ उनका पोल्ट्री व्यवसाय और 15 से 20 हजार रुपये तक की मासिक आय यह दर्शाती है कि अवसर, प्रशिक्षण और मेहनत के माध्यम से ग्रामीण महिलाएं अपनी आर्थिक स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती हैं।

