चक्रधरपुर | KNT के शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता प्रेम सिंह डिंगिल ने चक्रधरपुर और आसपास के क्षेत्रों से गए प्रवासी श्रमिकों के साथ हुई घटना को केवल मारपीट का मामला मानने से इनकार करते हुए इसे शिक्षा व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की विफलता का सीधा परिणाम बताया है। उनका कहना है कि जब तक युवाओं को अपने गांव में भविष्य नहीं दिखेगा, तब तक वे “नाला दिसुम” (बाहरी दुनिया) के लालच में फंसते रहेंगे।

तमिलनाडु के नमक्कल से लौटे श्रमिकों—अनिल समद और मंकी हेस्सा—के बयान बेहद चौंकाने वाले हैं। उन्होंने बताया कि कपड़ा मिलों में स्थिति बंधुआ मजदूरी जैसी थी, जहां मजदूरों के साथ न केवल मारपीट की गई, बल्कि उनकी मजदूरी तक रोक ली गई। कई मामलों में इलाज का खर्च भी मजदूरों से ही वसूला गया और उन्हें परिसर से बाहर निकलने तक की अनुमति नहीं थी।

सबसे चिंताजनक पहलू यह सामने आया कि कई किशोर-किशोरियां अपनी उम्र आधार कार्ड (Aadhaar) में बढ़ाकर इस “पलायन के जाल” में शामिल हो रहे हैं। यह न केवल गैरकानूनी है, बल्कि उन्हें किसी भी तरह की कानूनी सुरक्षा से भी वंचित कर देता है, जिससे वे शोषण के लिए आसान शिकार बन जाते हैं।

प्रेम सिंह डिंगिल के अनुसार, यह पूरी स्थिति दर्शाती है कि गांवों में शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास के अवसरों की कितनी भारी कमी है। “नाला दिसुम” जाना अब मजबूरी के साथ-साथ एक खतरनाक मानसिकता बनती जा रही है।
समाधान की दिशा में जरूरी कदम:
इस गंभीर सामाजिक संकट से निपटने के लिए केवल जांच नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत कदम जरूरी हैं—
पंचायत स्तर पर प्रवासी श्रमिकों का अनिवार्य पंजीकरण
झारखंड और तमिलनाडु सरकार के बीच बेहतर समन्वय और त्वरित रेस्क्यू सिस्टम
स्थानीय स्तर पर कौशल विकास और रोजगार के अवसर
बिचौलियों (एजेंट्स) की पहचान कर सख्त कानूनी कार्रवाई
यह मामला सिर्फ कुछ मजदूरों का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है—क्या हम अपने युवाओं को उनके ही घर में सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य दे पा रहे हैं?

