चाईबासा | आदिवासी हो समाज युवा महासभा के केंद्रीय उपाध्यक्ष सुरा बिरुली ने वीर शहीद गंगाराम कलुंडिया को आदिवासी अधिकारों और विस्थापन विरोधी आंदोलन का प्रतीक बताते हुए कहा कि वे भारतीय सेना के सम्मानित पूर्व सैनिक होने के साथ-साथ ईचा-खरकई बांध परियोजना के खिलाफ हुए जनसंघर्ष के प्रमुख नेता थे। उन्होंने कहा कि गंगाराम कलुंडिया ने आदिवासी गांवों के विस्थापन के विरुद्ध भीषण प्रतिरोध का नेतृत्व किया, जिसके कारण आज भी उन्हें शहीद के रूप में सम्मानपूर्वक याद किया जाता है।

सुरा बिरुली ने बताया कि गंगाराम कलुंडिया मात्र 19 वर्ष की आयु में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे और बिहार रेजिमेंट में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनके साहस और वीरता के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा उन्हें वीरता पदक से सम्मानित किया गया था।

सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित सुवर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना (ईचा-खरकई बांध) के कारण डूब क्षेत्र में आने वाले 80 से अधिक आदिवासी गांवों की सांस्कृतिक पहचान, जल-जंगल-जमीन और पैतृक भूमि की रक्षा के लिए जन आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने विस्थापित ग्रामीणों के उचित मुआवजे, पुनर्वास और अधिकारों की मांग को लेकर लगातार संघर्ष किया।

वीर शहीद गंगाराम कलुंडिया सेतु के नामकरण को लेकर आयोजित कार्यक्रम में आदिवासी हो समाज युवा महासभा एवं मानकी मुंडा संघ के कई पदाधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। इनमें युवा महासभा के केंद्रीय उपाध्यक्ष सुरा बिरुली, मानकी मुंडा संघ के केंद्रीय महासचिव सोना सुलेमान हांसदा, केंद्रीय शिक्षा सचिव शांति सिदु, दुर्गा चरण बारी, कोंदा सिदु, ललित बिरुली, शत्रुधन हांसदा एवं अनिल देवगम सहित अन्य लोग शामिल थे।

