रांची | झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren ने आगामी जनगणना 2027 में आदिवासियों के लिए ‘सरना धर्म कोड’ को अलग से शामिल करने की मांग को लेकर महत्वपूर्ण पहल की है। इस संबंध में उन्होंने देश की राष्ट्रपति Droupadi Murmu, प्रधानमंत्री Narendra Modi और झारखंड के राज्यपाल Santosh Kumar Gangwar को अलग-अलग पत्र लिखकर अपनी बात रखी है।

मुख्यमंत्री ने अपने पत्रों में कहा कि झारखंड राज्य की आधारशिला यहाँ की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और प्रकृति-आधारित जीवनशैली पर आधारित है, जिसे व्यापक रूप से ‘सरना धर्म’ के रूप में पहचान प्राप्त है। उन्होंने चिंता जताई कि वर्तमान जनगणना प्रारूप में अनुसूचित जाति और जनजाति का उल्लेख तो है, लेकिन आदिवासियों की विशिष्ट धार्मिक पहचान दर्ज करने के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं है, जिससे भविष्य की नीतियों और योजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में मुख्यमंत्री ने कहा कि आंकड़ों पर आधारित नीति निर्माण ही राष्ट्र के विकास का सर्वोत्तम मार्ग है। उन्होंने उल्लेख किया कि वर्ष 2011 की जनगणना के दौरान देश के 21 राज्यों में लगभग 50 लाख लोगों ने अलग कोड न होने के बावजूद स्वेच्छा से ‘सरना’ को धर्म के कॉलम में दर्ज कराया था, जो इस मांग की व्यापकता को दर्शाता है।
राष्ट्रपति को भेजे पत्र में उन्होंने संवैधानिक प्रावधानों और पांचवीं अनुसूची का हवाला देते हुए हस्तक्षेप का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति जनजातीय समाज की संरक्षक होने के नाते उनकी विशिष्ट पहचान को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

इसके अलावा, राज्यपाल से भी मुख्यमंत्री ने अनुरोध किया है कि झारखंड विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव और स्थानीय जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार के समक्ष इस मुद्दे पर सकारात्मक अनुशंसा भेजी जाए।
मुख्यमंत्री ने अपने पत्रों में यह भी उल्लेख किया कि भारत तकनीकी और डिजिटल क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है, ऐसे में जनगणना प्रपत्र में ‘सरना धर्म कोड’ को शामिल करना पूरी तरह संभव है। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि जनगणना के दूसरे चरण में इस पहचान को आधिकारिक मान्यता मिलती है, तो इससे न केवल सामाजिक समरसता को बल मिलेगा, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक अस्मिता को भी संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उचित स्थान मिलेगा।
पत्रों के अंत में मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि झारखंड की आकांक्षाओं और आदिवासी समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए आगामी जनगणना प्रपत्रों में आवश्यक संशोधन किए जाएं।

