चाईबासा | पश्चिमी सिंहभूम जिले के वन क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को आजीविका और आय का मजबूत आधार बनाने की दिशा में सहकारिता विभाग की पहल सकारात्मक परिणाम दे रही है। जोहार वन उत्पादक सहयोग समिति लिमिटेड, चाईबासा से जुड़े किसानों ने वैज्ञानिक प्रशिक्षण एवं आधुनिक तकनीकों को अपनाकर लाह उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। इस पहल ने पारंपरिक वन उत्पाद आधारित आजीविका को संगठित, वैज्ञानिक और बाजारोन्मुख स्वरूप प्रदान करते हुए किसानों को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया है।
वैज्ञानिक प्रशिक्षण से बदली उत्पादन की तस्वीर
जोहार वन उत्पादक सहयोग समिति लिमिटेड, चाईबासा से जुड़े 50 किसानों को लाह उत्पादन का विशेष वैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया गया। सहकारिता विभाग के सहयोग से रांची स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय कीट विज्ञान अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा चक्रधरपुर के सभागार कक्ष में यह प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

प्रशिक्षण के दौरान किसानों को लाह उत्पादक एवं पोषक वृक्षों के वैज्ञानिक चयन, लाह कीट पालन, रख-रखाव, उत्पादन प्रक्रिया तथा लाह की कटाई से संबंधित महत्वपूर्ण व्यावहारिक जानकारी दी गई। प्रशिक्षण के उपरांत प्रत्येक किसान को 5 किलोग्राम लाह बीज के साथ आवश्यक सामग्री भी उपलब्ध कराई गई।
उत्पादन में लगभग पांच गुना वृद्धि, बिक्री मूल्य भी बढ़ा
वैज्ञानिक प्रशिक्षण का सीधा और सकारात्मक प्रभाव किसानों के उत्पादन पर देखने को मिला। प्रशिक्षण प्राप्त सभी 50 किसानों ने वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाया, जिसके परिणामस्वरूप लाह उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और उत्पादन लगभग पांच गुना तक बढ़ गया।
इस सफलता से किसानों में लाह उत्पादन के प्रति रुचि और विश्वास बढ़ा है तथा वन आधारित आजीविका को एक मजबूत आधार मिला है। समिति के अध्यक्ष श्री जगदीश सुंडी एवं अन्य सदस्यों के अनुसार, प्रशिक्षण से पहले किसान लगभग 450 से 500 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से लाह बेचते थे, जबकि वर्तमान में लाह लगभग 900 से 1000 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही है। इससे किसानों की आय में स्पष्ट वृद्धि हुई है।

समिति द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, ग्राम करकट्टा, पंचायत नरसंडा, प्रखंड चाईबासा निवासी समिति अध्यक्ष श्री जगदीश सुंडी ने वर्ष 2026 में अब तक लगभग 10 लाख रुपये मूल्य की लाह की बिक्री की है।
लाभुक की सफलता बनी अन्य किसानों के लिए प्रेरणा
समिति के सदस्य श्री प्रेमगान सुंडी, ग्राम लातर गजरा, पोस्ट बड़ालागिया ने बताया कि वैज्ञानिक प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीकों को अपनाने के बाद लाह उत्पादन उनके लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है। उन्होंने पिछले छह महीनों में लगभग 1.20 लाख रुपये मूल्य की लाह की बिक्री की है।
उन्होंने बताया कि पहले लाह उत्पादन पारंपरिक तरीके से किया जाता था। प्रशिक्षण के बाद उन्हें लाह कीट पालन, पोषक वृक्षों की देखभाल और वैज्ञानिक तरीके से लाह की कटाई की जानकारी मिली। इसका परिणाम उत्पादन में वृद्धि और बेहतर आर्थिक प्रतिफल के रूप में सामने आया है।

श्री प्रेमगान सुंडी ने कहा कि अब वे लाह उत्पादन को अपने परिवार की आय मजबूत करने के साथ-साथ भविष्य में आजीविका का एक स्थायी आधार बनाने के रूप में देख रहे हैं।
सहकारिता से संगठित उत्पादन और बेहतर बाजार की राह
जिला सहकारिता पदाधिकारी श्रीमती अमिता कुमारी ने कहा कि जोहार वन उत्पादक सहयोग समिति लिमिटेड के माध्यम से किसानों को एकजुट कर उन्हें वैज्ञानिक प्रशिक्षण, तकनीकी जानकारी और उत्पादन से जुड़ी आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना सहकारिता विभाग की महत्वपूर्ण पहल है।
उन्होंने कहा कि लाह जैसे पारंपरिक वन उत्पाद को वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार संभव है। किसानों द्वारा प्राप्त परिणाम यह दर्शाते हैं कि प्रशिक्षण, सामूहिक प्रयास और बेहतर विपणन व्यवस्था के माध्यम से वन उत्पादक परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।

उन्होंने बताया कि विभाग का उद्देश्य किसानों को केवल उत्पादन तक सीमित रखना नहीं है, बल्कि उन्हें संगठित उत्पादन, मूल्यवर्धन और बेहतर बाजार से जोड़ते हुए आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है।
आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
लाह उत्पादन में वृद्धि से किसानों के लिए अतिरिक्त आय और रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं। वैज्ञानिक प्रशिक्षण के माध्यम से उनकी तकनीकी क्षमता में वृद्धि हुई है तथा उन्हें सामूहिक रूप से उत्पादन एवं विपणन की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिला है।
इस प्रकार जोहार वन उत्पादक सहयोग समिति किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और वन आधारित आजीविका को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

उपायुक्त का संदेश—“सहकारिता से समृद्धि”
पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त श्री मनीष कुमार ने कहा कि, “सहकारिता केवल किसानों को एक मंच पर संगठित करने का माध्यम नहीं है, बल्कि स्थानीय संसाधनों को आर्थिक समृद्धि में बदलने का एक प्रभावी साधन है। पश्चिमी सिंहभूम जैसे वन बहुल जिले में लाह सहित अन्य वन उत्पादों से जुड़े परिवारों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और बेहतर बाजार उपलब्ध कराकर उनकी आय में वृद्धि की जा सकती है।”
उन्होंने कहा कि जोहार वन उत्पादक सहयोग समिति की सफलता इस बात का उदाहरण है कि जब पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक और सहकारिता की सामूहिक शक्ति से जोड़ा जाता है, तो आजीविका के नए अवसर सृजित होते हैं।
उपायुक्त ने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि जिले के वन उत्पादक किसान संगठित होकर अपने उत्पादों का बेहतर मूल्य प्राप्त करें और ‘सहकारिता से समृद्धि’ के संकल्प के साथ आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनें।”
जोहार वन उत्पादक सहयोग समिति की यह पहल इस बात का प्रमाण है कि उचित प्रशिक्षण, वैज्ञानिक तकनीक और सहकारिता के सामूहिक प्रयास से पारंपरिक वन उत्पादों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत कड़ी बनाया जा सकता है। 50 किसानों को दिए गए प्रशिक्षण के बाद लाह उत्पादन में लगभग पांच गुना वृद्धि और बिक्री मूल्य में उल्लेखनीय सुधार ने पश्चिमी सिंहभूम में वन आधारित आजीविका को एक नई दिशा दी है।

