आदिवासी किसान मजदूर पार्टी के बैनर तले कोल्हान क्षेत्र में शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि

खरसावां : आज आदिवासी किसान मजदूर पार्टी के बैनर तले जिला अध्यक्ष मानसिंह तिरिया एवं सरायकेला जिला अध्यक्ष सुनील गगाराई के संयुक्त तत्वावधान में कोल्हान क्षेत्र के खरसावां, सेरेंगसिया, जगन्नाथपुर और राजाबासा में शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर शहीदों के अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मानसिंह तिरिया ने कहा कि कोल विद्रोह में शहीद हुए वीरों को याद कर उन्हें नमन किया गया। उन्होंने कहा कि 1 जनवरी को कोल्हान और 2 जनवरी को कलिंगनगर में हमारे ही आदिवासी भाइयों की निर्मम हत्या की गई थी, जिसकी हम कड़ी निंदा करते हैं। अंग्रेजों ने 1 और 2 जनवरी को आदिवासियों की हत्या कर इसे अपने लिए जश्न का दिन बना लिया। इस इतिहास को जानना हर आदिवासी के लिए जरूरी है और इन दिनों को शहीद दिवस के साथ-साथ संकल्प दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य है कि जिन लोगों ने आदिवासियों पर गोलियां चलाईं, आज वही खुद को आदिवासी समाज का हितैषी बता रहे हैं।
उन्होंने कोल विद्रोह के जननायक वीर शहीद पोटो हो’ का उल्लेख करते हुए कहा कि फांसी के कई वर्षों बाद उनके नाम से राजाबासा गांव की पहचान बनी, लेकिन आज उस गांव की स्थिति बेहद दयनीय है। ग्रामीण जैंतगढ़, चंपुआ और अन्य क्षेत्रों में मजदूरी कर जीवन यापन कर रहे हैं। उन्होंने सरकार से गांव को गोद लेकर विकास पर ध्यान देने की मांग की।
मानसिंह तिरिया ने बताया कि आज ही के दिन गवर्नर जनरल के राजनीतिक एजेंट कैप्टन थॉमस विल्किंसन ने हो’ दिसुम (वर्तमान कोल्हान) के महान योद्धा पोटो हो’, नारा हो’, बड़ाय हो’, पांडुवा हो’ और बोड़ेया हो’ को फांसी की सजा सुनाई थी, जबकि अन्य सहयोगी योद्धाओं को कारावास की सजा दी गई थी।
उन्होंने कहा कि हो’ विद्रोह (1820-21), महान कोल विद्रोह (1831-32) और सेरेंगसिया घाटी युद्ध (1837) के दौरान लगभग 17 वर्षों तक अंग्रेजों और हो’ आदिवासियों के बीच भीषण संघर्ष हुआ। अंग्रेज जानते थे कि यदि पोटो हो’ और उनके साथी जीवित रहे, तो वे कोल्हान में कभी स्थायी रूप से शासन नहीं कर पाएंगे। इसी कारण 1 जनवरी 1838 को जगन्नाथपुर बाजार स्थित बरगद के पेड़ पर पोटो हो’, नारा हो’ और बड़ाय हो’ को फांसी दी गई, जबकि 2 जनवरी 1838 को सेरेंगसिया गांव में पीपल के पेड़ पर बोड़ेया हो’ और पांडुवा हो’ को फांसी दी गई। इस घटना पर लंदन बोर्ड ने भी आपत्ति जताई थी।
कार्यक्रम में सरायकेला जिला अध्यक्ष सुनील गगाराई ने कहा कि 1-2 जनवरी को फांसी देना अंग्रेजों की सोची-समझी राजनीतिक साजिश थी, ताकि आदिवासी अपने इतिहास और पूर्वजों को भूलकर नए साल के जश्न में डूबे रहें।
उन्होंने आगे कहा कि देश की आजादी के बाद 1 जनवरी 1948 को सरायकेला-खरसावां रियासत के ओडिशा में विलय और अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर खरसावां हाट मैदान में आदिवासियों की एक बड़ी शांतिपूर्ण सभा आयोजित हुई थी, जिस पर ओडिशा पुलिस ने मशीनगन से गोलीबारी की थी।
इस कार्यक्रम में चुमरू पिंगुवा, सजान देवगम, सुनील लागुरी, मदन सिंकु, नरसिंह पुर्ती, माटा करोवा, अर्जुन मुंडा, जोसेफ मुंडा, लुकुना पुर्ती, दामू बोबोंगा, सादु मुंडा, पुष्पा मुंडा, शांति पुर्ती, सरस्वती सवैया, हीरा मुनी सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित थे।

By maskal.news

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