पेसा नियमावली 2025 पर उठे सवाल, आदिवासी स्वशासन को लेकर चिंत

चाईबासा : झारखंड निर्माण के 25 वर्षों बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अगुवाई वाली राज्य कैबिनेट द्वारा पेसा नियमावली 2025 को पारित किया जाना एक स्वागत योग्य कदम माना जा रहा है। हालांकि, इसे लेकर अभी बधाई देना जल्दबाजी होगी। यह देखना जरूरी है कि क्या इस नियमावली के माध्यम से पेसा कानून 1996 का मूल उद्देश्य—पारंपरिक ग्रामसभाओं को वास्तविक शासन शक्ति और अधिकार देना—पूरी तरह पूरा हो पा रहा है या नहीं।

आदिवासी संगठनों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि यदि पेसा नियमावली 2025 के तहत फिर से पारंपरिक आदिवासी स्वशासन व्यवस्था पर पंचायत राज व्यवस्था थोपने का प्रयास किया गया, तो इसका कड़ा विरोध किया जाएगा। आरोप है कि झारखंड कैबिनेट ने संसदीय अधिनियम 1996 के अनुरूप नियमावली बनाने के बजाय झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 की त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था को ही लागू कर दिया है।

गौरतलब है कि झारखंड उच्च न्यायालय ने आदिवासी बुद्धिजीवी मंच द्वारा दायर जनहित याचिका (WP(PIL) No. 1589/2021) में स्पष्ट कहा था कि पंचायत राज अधिनियम 2001 को संसदीय अधिनियम 1996 के अनुरूप नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद राज्य सरकार द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों के लिए बने संसदीय अधिनियम 1996 को नजरअंदाज कर नियमावली पारित करने पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान पेसा नियमावली 2025, संसदीय अधिनियम 1996 की धारा 3 और धारा 4(एम) के प्रावधानों के विपरीत है, जिनमें ग्रामसभा और पंचायतों को कुछ अपवादों के साथ कुल सात महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं। ऐसे में यह नियमावली आदिवासी स्वशासन की भावना को कमजोर करती प्रतीत हो रही है।

By maskal.news

You May Also Like