सरायकेला | ऐतिहासिक गुंडिचा मंदिर में आयोजित रथयात्रा महोत्सव के अंतिम दिन गुरुवार को श्रद्धा, आस्था और सनातन परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला। इस अवसर पर महाप्रभु श्री जगन्नाथ ने भगवान विष्णु के प्रथम अवतार मत्स्य का, जबकि उनके बड़े भाई श्री बलभद्र ने कूर्म (कच्छप) अवतार का दिव्य स्वरूप धारण किया।

देवी सुभद्रा के साथ विराजमान इस दुर्लभ वेश के दर्शन के लिए सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। “जय जगन्नाथ” के जयघोष से पूरा परिसर भक्तिमय हो उठा और श्रद्धालुओं ने प्रभु के दुर्लभ दर्शन कर स्वयं को धन्य माना।

सरायकेला की रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की जीवंत पहचान भी है। महोत्सव के दौरान महाप्रभु के विभिन्न दुर्लभ वेशों का श्रृंगार किया जाता है, जिनमें अंतिम दिन का मत्स्य-कूर्म वेश विशेष महत्व रखता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस प्रकार का दिव्य स्वरूप सरायकेला की विशिष्ट परंपरा है और देश के अन्य रथयात्रा आयोजनों में ऐसा दर्शन देखने को नहीं मिलता।

सनातन धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार उनका प्रथम अवतार माना जाता है। मान्यता है कि महाप्रलय के समय उन्होंने वेदों की रक्षा करते हुए राजा मनु और सप्तऋषियों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया तथा नई सृष्टि की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इसी कारण मत्स्य अवतार को ज्ञान, संरक्षण और नवसृजन का प्रतीक माना जाता है।

रथयात्रा महोत्सव के समापन अवसर पर श्रद्धालुओं ने महाप्रभु के इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की तथा परिवार और समाज की सुख-समृद्धि एवं मंगलकामना की। पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर श्रद्धालुओं की आस्था, भक्ति और उत्साह से सराबोर रहा।


