नई दिल्ली | वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि “सुपर अल-नीनो” अब केवल इतिहास की एक भयावह घटना नहीं रह गया है, बल्कि वर्ष 2026 में इसके दोबारा गंभीर रूप लेने की आशंका बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रशांत महासागर में तेजी से बढ़ता तापमान दुनिया को एक बड़े जलवायु संकट की ओर धकेल सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्ष 1877-78 में आए अब तक के सबसे शक्तिशाली अल-नीनो ने वैश्विक स्तर पर भारी तबाही मचाई थी। उस दौरान दुनिया के कई हिस्सों में भीषण सूखा, फसलों की बर्बादी, अकाल और बीमारियों का लंबा दौर देखने को मिला था। अब 2026 में फिर वैसी ही परिस्थितियां बनने के संकेत मिल रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, प्रशांत महासागर की सतह और गहराई दोनों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है। कुछ जलवायु पूर्वानुमानों में यह आशंका जताई गई है कि मौजूदा स्थिति 1877-78 के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार खतरा इसलिए अधिक है, क्योंकि आज पृथ्वी पहले से ही ग्लोबल वार्मिंग के कारण ज्यादा गर्म हो चुकी है। ऐसे में सूखा, बाढ़, गर्मी की लहर और खाद्य संकट जैसी आपदाओं की तीव्रता बढ़ सकती है।

इतिहास के अनुसार, 1876 से 1878 के बीच आए सुपर अल-नीनो ने भारत, चीन, ब्राजील और अफ्रीका के बड़े हिस्सों को गंभीर रूप से प्रभावित किया था। कई क्षेत्रों में मानसून पूरी तरह विफल हो गया था, जिससे फसलें सूख गईं, पशुधन नष्ट हो गया और करोड़ों लोग भुखमरी का शिकार हुए। विभिन्न अनुमानों के मुताबिक उस समय दुनिया की कुल आबादी का लगभग 2 से 3 प्रतिशत प्रभावित हुआ था और करीब 3 से 6 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। कई विशेषज्ञ यह आंकड़ा लगभग 5 करोड़ तक बताते हैं।

जलवायु वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि मौजूदा तापमान वृद्धि का सिलसिला जारी रहा, तो आने वाले महीनों में दुनिया को गंभीर पर्यावरणीय और मानवीय चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

