झारखंड | झारखंड की राजनीति में एक बार फिर जनसंख्या संतुलन और क्षेत्रीय पहचान का मुद्दा चर्चा का केंद्र बन गया है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री Champai Soren ने सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान राज्य की बदलती डेमोग्राफी को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इसका प्रभाव आने वाले समय में झारखंड की राजनीति और सामाजिक संरचना पर पड़ सकता है।

अपने संबोधन में चंपाई सोरेन ने दावा किया कि सरायकेला-खरसावां जिले के कपाली समेत कई इलाकों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान आबादी के स्वरूप में तेजी से बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में पहले आदिवासी और मूलवासी आबादी अधिक थी, वहां अब परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, “करीब 30 वर्ष पहले कपाली में विशेष समुदाय का एक भी घर नहीं था, लेकिन आज वहां हजारों वोटर हो चुके हैं।”

पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि झारखंड में विकास कार्यों की गति धीमी पड़ गई है और आम लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों का असर झारखंड की राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है और आने वाले समय में राज्य की राजनीतिक तस्वीर बदल सकती है।
कार्यक्रम के दौरान चंपाई सोरेन ने प्रधानमंत्री Narendra Modi और भाजपा की नीतियों की सराहना करते हुए कहा कि जनता अब विकास और सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देकर अपने फैसले ले रही है। उनके बयान पर कार्यक्रम में मौजूद समर्थकों ने जोरदार समर्थन भी जताया।

हालांकि, चंपाई सोरेन के इस बयान को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। विपक्षी दल इसे राजनीतिक बयानबाजी करार दे रहे हैं, जबकि समर्थकों का कहना है कि यह राज्य के भविष्य और क्षेत्रीय पहचान से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।

