कोल्हान विश्वविद्यालय में विगत दिनों सम्पन्न हुए दीक्षांत समारोह पर यदि गंभीरता से ध्यान दिया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि “कोल्हान” नाम का उपयोग तो किया जा रहा है, पर ऐसा लगता है कि इसकी असली पहचान और सांस्कृतिक आत्मा को वह स्थान नहीं दिया जा रहा जिसकी यह हकदार है।
जैसा कि सर्वविदित है, कोल्हान झारखंड, भारत का एक ऐतिहासिक और प्रशासनिक क्षेत्र है, जहाँ मुख्य रूप से हो’ आदिवासी समुदाय निवास करता है।
“कोल्हान” शब्द ‘हो’ भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है:-
कोल : औपनिवेशिक काल में हो’/कोल समुदाय के लिए प्रयुक्त होनेवाले शब्द है।
हान : जिसका अर्थ ‘लोग’ या ‘मानव’
इस प्रकार कोल्हान का अर्थ है : कोल लोगों की भूमि, अर्थात आदिवासियों का क्षेत्र।
1831–33 के कोल विद्रोह के बाद 1837 में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा स्थापित कोल्हान गवर्नमेंट एस्टेट ने इस क्षेत्र को ऐतिहासिक महत्त्व प्रदान किया। इसी गौरव व इतिहास के सम्मान में चाईबासा स्थित विश्वविद्यालय का नाम कोल्हान विश्वविद्यालय रखा गया, ताकि इस भूमि की पहचान, संस्कृति और भाषा जीवित रहे।
परन्तु आज बड़ा प्रश्न यह है कि,
आदिवासी समाज को क्यों केवल नृत्य–गान तक सीमित दिखाया या इस्तेमाल किया जा रहा है?
क्या हम अपने ही क्षेत्र में बने विश्वविद्यालयों, संस्थानों और कार्यक्रमों में अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को सम्मानपूर्वक स्थापित नहीं कर सकते?
जब कोई कार्यक्रम कोल्हान में आयोजित होता है, तो यह स्वाभाविक है कि उसकी शुरुआत और संपूर्ण आयोजन *कोल्हान की सांस्कृतिक आत्मा से संपन्न होना चाहिए। जैसे-
👉 कोल्हान की भाषा,
👉 कोल्हान की प्रार्थना,
👉 कोल्हान के पारंपरिक गीत–संगीत,
👉 कोल्हान के परिधान और रीति–रिवाज।
लेकिन खेद की बात है कि ऐसे आयोजनों में न तो हो’ भाषा बोली जा रही है, न ही कोल्हान की पोशाकें, परंपराएँ या सांस्कृतिक प्रतीक दिखाई दे रहे हैं।
ऐसा लग रहा है कि “कोल्हान” केवल एक नाम बनकर रह गया है। उसकी असली पहचान कहीं खोती जा रही है।
संस्कृत व अन्य भाषाएँ और संस्कृतियाँ अपने स्थान पर सम्मानित हैं, पर अपने ही क्षेत्र में अपनी भाषा को स्थान न मिलना चिंता का विषय है।
मेरी आदिवासी समाज के भाइयों-बहनों से विनम्र अपील है कि “खुद को केवल नाच–गान तक सीमित न रखें। अपनी भाषा, संस्कृति, गरिमा और अधिकारों की मांग करना सीखिए।
यदि हम स्वयं आगे नहीं आएँगे, तो एक दिन हमारी पहचान धीरे–धीरे मिटा दी जाएगी।
आइए, मिलकर संकल्प लें –
👉 अपने क्षेत्र की पहचान को बचाने का,
👉 अपनी भाषा को उसके योग्य सम्मान दिलाने का, और
👉 कोल्हान की संस्कृति को गर्व के साथ हर मंच पर प्रस्तुत करने का।
✍️बोदरा घनश्याम
तिलोपदा, केरा, चक्रधरपुर
प. सिंहभूम, झारखंड

