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नाम बड़े, नीयत छोटी? संसद में पेश बजट पर जनता के हितों को लेकर गंभीर सवाल:- धी. रामहरि पेरियार

नाम बड़े, नीयत छोटी? संसद में पेश बजट पर जनता के हितों को लेकर गंभीर सवाल:- धी. रामहरि पेरियार

चाईबासा : एंटी करप्शन ऑफ इंडिया, झारखंड प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व लोकसभा व विधानसभा प्रत्याशी रहे धी. रामहरि पेरियार ने संसद में आज केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार की योजनाओं, परियोजनाओं और वादों के नाम चाहे जितने बड़े हों, यदि उनका क्रियान्वयन ईमानदारी और पारदर्शिता से नहीं होता, तो वे जनता के साथ छल के अलावा कुछ नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि बजट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह सरकार की नीति, नीयत, चरित्र और चेहरा होता है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार वास्तव में गरीब, बहुजन, दलित, आदिवासी, पिछड़े और मेहनतकश वर्गों के हित में कार्य कर रही है या फिर बड़े पूंजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों के संरक्षण में सत्ता चला रही है।
        धी. रामहरि पेरियार ने विशेष रूप से यह सवाल उठाया कि आत्मनिर्भर भारत की बात करते हुए सरकार ने सरकारी क्षेत्र को कितना मजबूत किया है और क्या यह बजट बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के कल्याणकारी संविधान की आत्मा के अनुरूप है या नहीं। उन्होंने कहा कि संविधान केवल शासन का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समानता और मानव गरिमा की गारंटी है।
   उन्होंने आगे कहा कि आज के बजट को इस कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए कि पिछले वर्ष के बजट में किए गए वादे और आश्वासन कितने पूरे हुए। क्या वे केवल रस्म अदायगी बनकर रह गए या वास्तव में उन्होंने जनता के जीवन में कोई सकारात्मक परिवर्तन लाया? जनता को अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि ठोस परिणाम चाहिए।
    उन्होंने यह भी कहा कि वास्तविक विकास का मूल्यांकन GDP से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में आए गुणात्मक बदलाव से किया जाना चाहिए। क्या बेरोजगारी घटी? क्या किसानों की आय बढ़ी? क्या शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और सामाजिक सुरक्षा आम जनता तक पहुँची? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है, तो किसी भी बजट को सफल नहीं कहा जा सकता।
   धी. रामहरि पेरियार ने केंद्र सरकार से मांग की कि वह बजट के नाम पर जनता को भ्रमित करने के बजाय अपने पिछले दावों पर श्वेत पत्र जारी करे और बताए कि किस योजना का कितना लाभ जनता तक पहुँचा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार वास्तव में अच्छे दिन लाना चाहती है, तो उसे नीयत, नीति और न्यायपूर्ण क्रियान्वयन से यह सिद्ध करना होगा, न कि केवल शब्दों और आंकड़ों के माध्यम से।
अंत में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ी पूंजी है और उसका विश्वास खोना किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा नुकसान है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह बजट को केवल संसद में पारित कराने का औपचारिक दस्तावेज न बनाए, बल्कि इसे जनहित, सामाजिक न्याय और संविधान की आत्मा से जोड़कर लागू करे।