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पेसा नियमावली 2025 को लेकर झारखंड में कानूनी बहस तेज

पेसा नियमावली 2025 को लेकर झारखंड में कानूनी बहस तेज

झारखंड सरकार द्वारा बहुप्रतीक्षित पेसा नियमावली–2025 को अधिसूचित किए जाने के बाद इसके समर्थन और विरोध में राज्यभर में बहस शुरू हो गई है। यह नियमावली झारखंड पंचायत राज अधिनियम–2001 (जेपीआरए) की धारा 131(1) के तहत बनाई गई है, जिसमें सरकार को अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नियमावली बनाने का अधिकार दिया गया है।
हालांकि, इस नियमावली की वैधानिकता को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि जेपीआरए–2001 संविधान के भाग–9 के तहत सामान्य क्षेत्रों के लिए बना कानून है, जबकि संविधान का अनुच्छेद 243(एम) अनुसूचित क्षेत्रों में भाग–9 के प्रावधानों को लागू करने से स्पष्ट रूप से रोकता है।
आलोचकों के अनुसार, यदि अनुसूचित क्षेत्र और सामान्य क्षेत्र के कानूनों के बीच टकराव होता है, तो जेपीआरए–2001 के प्रावधान पेसा नियमावली–2025 पर हावी हो जाएंगे, जिससे पेसा नियमावली निष्प्रभावी हो सकती है।
इसके अलावा, पेसा अधिनियम–1996 की धारा 5 के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों से संबंधित कोई भी असंगत राज्य कानून केवल एक वर्ष तक ही प्रभावी रह सकता है। इस संदर्भ में जेपीआरए–2001 की धारा 1(ii) को पांचवीं अनुसूची और राष्ट्रपति आदेश–1950 के विपरीत बताया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद केवल एक नियमावली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संविधान, पेसा अधिनियम, पांचवीं अनुसूची और राज्य के सामान्य पंचायत कानूनों के बीच अधिकारों के टकराव का मामला है। इसे अनुसूचित क्षेत्रों में राज्य के सामान्य कानूनों को “पिछले दरवाजे से” लागू करने का प्रयास बताया जा रहा है।
यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि क्या एक स्वतंत्र केंद्रीय कानून (पेसा अधिनियम–1996) की नियमावली, राज्य के पंचायत कानून जेपीआरए–2001 के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाई जा सकती है, जबकि जेपीआरए की धारा 131 केवल उसी अधिनियम के प्रयोजनों के लिए नियम बनाने की अनुमति देती है।
इस पूरे मामले ने झारखंड में पेसा कानून के वास्तविक क्रियान्वयन और आदिवासी स्वशासन के अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
— बिर सिंह बिरुली
अध्यक्ष, ईचा–खरकई बांध विरोधी संघ, कोल्हान