#चाईबासा #पश्चिमीसिंहभूम #25YearsOfJharkhand #विकाससेवंचित #JharkhandPolitics

25 साल बाद भी पिछड़ा पश्चिमी सिंहभूम: पाँचों विधानसभा क्षेत्रों में विकास कार्य ठप

25 साल बाद भी पिछड़ा पश्चिमी सिंहभूम: पाँचों विधानसभा क्षेत्रों में विकास कार्य ठप

पश्चिमी सिंहभूम : झारखंड के गठन को 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन पश्चिमी सिंहभूम जिला आज भी बुनियादी विकास से वंचित है। झामुमो और कांग्रेस के लंबे शासन के बावजूद जिले की पाँचों विधानसभा—चाईबासा, मंझगांव, जगन्नाथपुर, चक्रधरपुर और मनोहरपुर—जन समस्याओं से जूझ रही हैं।

चाईबासा विधानसभा, जहाँ झामुमो के विधायक और वर्तमान मंत्री दीपक बिरूआ प्रतिनिधित्व करते हैं, जिला मुख्यालय होने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी से परेशान है। शहर में ट्रैफिक अव्यवस्था और “नो एंट्री” को लेकर हाल ही में बड़े आंदोलन हुए। मेडिकल कॉलेज, सड़क और जलनिकासी जैसी योजनाएँ अधर में पड़ी हैं।

जगन्नाथपुर विधानसभा में कांग्रेस विधायक सोनाराम सिंकू के प्रति जनता की नाराज़गी बढ़ रही है। खनिज संपदा से भरपूर इस क्षेत्र में सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा के अभाव को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

मनोहरपुर विधानसभा में वर्षों से मांझी परिवार का दबदबा है, लेकिन वाइल्ड सेंचुरी घोषित होने के बाद आदिवासी समुदाय बेहद नाराज़ है। क्षेत्र में सड़क, शिक्षा और रोजगार की स्थिति खराब है।

चक्रधरपुर विधानसभा में झामुमो विधायक सुखराम उरांव दूसरी बार चुने गए हैं, लेकिन शिक्षा, रोजगार और रेलवे क्षेत्र में स्थानीय युवाओं को अब तक कोई ठोस अवसर नहीं मिला।

मंझगांव विधानसभा में निरल पूर्ति कई बार विधायक रहने के बावजूद एक भी कॉलेज या टेक्निकल शिक्षा केंद्र नहीं बन पाया। स्वास्थ्य सेवाओं का हाल भी जर्जर है।

पश्चिमी सिंहभूम का सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि पाँचवीं अनुसूची, वन अधिकार पट्टा और पेसा कानून के तहत मिलने वाले संवैधानिक अधिकार आज भी कागज़ों में सिमटे हुए हैं। ग्राम सभाओं की शक्ति और जल-जंगल-जमीन पर स्वामित्व लगातार कमजोर किया गया है। वर्षों तक सत्ता में रहे सांसदों और विधायकों पर जनजातीय हितों की उपेक्षा का आरोप लग रहा है।

अब आदिवासी जनता सवाल पूछ रही है — “हमारे संवैधानिक अधिकार हमें कब मिलेंगे?”

— जितेंद्र नाथ ओझा