चाईबासा | एंटी करप्शन ऑफ इंडिया के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष धी रामहरि पेरियार ने झारखंड, विशेषकर पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा-कोल्हान क्षेत्र में विकास के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जमीनी स्तर पर स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। उन्होंने कहा कि खनिज संपदा से समृद्ध गुआ, किरीबुरु, मेघाहातुबुरु और आसपास के क्षेत्रों के लोग आज भी रोजगार और आजीविका के अभाव में 100 किलोमीटर से अधिक दूरी तय कर चाईबासा पहुंचकर लकड़ी, दातून और जंगल से प्राप्त अन्य उत्पाद बेचने को मजबूर हैं।

धी रामहरि पेरियार ने बताया कि चाईबासा रेलवे स्टेशन परिसर में उनकी मुलाकात ऐसे कई लोगों से हुई, जिन्होंने क्षेत्र में रोजगार के सीमित अवसरों की समस्या साझा की। लोगों ने बताया कि परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्हें जंगलों से लकड़ी, दातून और पत्ते लाकर बाजारों में बेचना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति उस क्षेत्र की वास्तविक तस्वीर पेश करती है, जहां से हर वर्ष करोड़ों-अरबों रुपये मूल्य के लौह अयस्क और अन्य खनिजों का दोहन किया जाता है।

उन्होंने कहा कि यदि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र के मूल निवासी ही रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो विकास के दावों की गंभीर समीक्षा आवश्यक है। उनके अनुसार विकास का अर्थ केवल खदानों का विस्तार, राजस्व संग्रह या बड़ी परियोजनाओं की स्थापना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका वास्तविक लाभ स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में सुधार के रूप में दिखाई देना चाहिए।
धी रामहरि पेरियार ने राज्य सरकार, जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों से गुआ एवं आसपास के क्षेत्रों में रोजगार सृजन, स्वरोजगार, लघु उद्योग, वनाधारित आजीविका, शिक्षा और कौशल विकास से जुड़ी प्रभावी योजनाएं लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि ऐसी योजनाएं लागू होने से लोगों को आजीविका के लिए लंबी दूरी तय करने की मजबूरी से राहत मिल सकेगी।

उन्होंने कहा कि विकास के आंकड़ों से आगे बढ़कर जमीनी सच्चाई को देखने की आवश्यकता है। जब खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र का आम नागरिक लकड़ी और दातून बेचकर जीवन यापन करने को मजबूर हो, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि विकास का लाभ आखिर किसे मिल रहा है। इस गंभीर मुद्दे पर उन्होंने राज्य सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और नीति-निर्माताओं से गंभीरता से विचार कर ठोस कदम उठाने की अपील की है।

