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सारंडा के रेड़ा टोला में विकास की पोल—78 साल बाद भी पानी के लिए संघर्ष, महिलाओं ने सरकार से पूछा तीखा सवाल

सारंडा के रेड़ा टोला में विकास की पोल—78 साल बाद भी पानी के लिए संघर्ष, महिलाओं ने सरकार से पूछा तीखा सवाल

मनोहरपुर : जहां झारखंड अपने 25 वर्षों के सफर में तेज रफ्तार विकास का दावा करता है, वहीं सारंडा के समथा गांव के रेड़ा टोला की स्थिति इस दावे को सीधा चुनौती देती है। आज़ादी के 78 साल बाद भी यहां की तस्वीर गांव नहीं, बल्कि उपेक्षा और संघर्ष की कहानी कहती है।

पेयजल संकट — सबसे बड़ी चिंता
रेड़ा टोला में पेयजल की समस्या इतनी गंभीर है कि महिलाओं का दिन पानी की तलाश से शुरू होकर पानी पर ही समाप्त हो जाता है। बरसात में नाला उफान पर होता है, और कमर तक पानी पार करके पीने का पानी लाना पड़ता है। गर्मी में नाला सूख जाता है, तब महिलाएं नमी वाली जगहों पर चुवाँ (छोटे गड्ढे) बनाकर पानी छानकर पीने को मजबूर होती हैं।

एक महिला ने स्पष्ट शब्दों में कहा —
“घर में खाने से ज्यादा मुश्किल पानी लाना है। सरकार सुनती है, लेकिन काम नहीं करती।”

नेताओं के वादे बनाम ज़मीन की हकीकत
चुनाव के समय नेताओं के भाषणों में विकास की बरसात होती है, लेकिन रेड़ा टोला की महिलाओं के लिए पानी लाना आज भी संघर्ष का पर्याय है। हर चुनाव के बाद यहां सिर्फ वादे लौटते हैं, नतीजे नहीं।

अधूरी योजनाओं की लंबी सूची

हर घर जल योजना अभी तक पूरी नहीं

स्वास्थ्य केंद्र दूर और अनुपलब्ध

सड़कें उबड़-खाबड़ और खतरनाक

सरकारी सप्लाई व्यवस्था ठप


गांव की महिलाओं का सरकार से सीधा सवाल

क्या हमें साफ पानी के लिए और सौ साल इंतज़ार करना पड़ेगा?

क्या विकास सिर्फ शहरों तक सीमित है?

क्या हम सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गए हैं?

25 साल के झारखंड का यही विकास मॉडल है?


झारखंड की पहचान भले ही जंगल, खनिज और समृद्ध संस्कृति से हो, लेकिन रेड़ा टोला जैसे गांव आज भी हाशिये पर हैं — भूले हुए नक्शों और अधूरे वादों के बीच फंसे हुए।

सरकार से जवाब मांगता है रेड़ा टोला
क्या विकास का अधिकार सबका है, या सिर्फ चुनिंदा इलाकों का?