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झारखंड में पेसा नियमावली को लेकर आदिवासी संगठनों ने जताई नाराज़गी

झारखंड में पेसा नियमावली को लेकर आदिवासी संगठनों ने जताई नाराज़गी

झारखंड में पेसा कानून की नियमावली को लेकर आदिवासी समाज में गहरी नाराज़गी देखी जा रही है। आरोप है कि राज्य सरकार ने पेसा के पहले ही पन्ने में ग्राम सभा के अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर पारंपरिक ग्राम प्रधानों के अलावा “अन्य” का विकल्प जोड़कर पिछला दरवाज़ा खोल दिया है। इससे आदिवासी समाज की परंपरागत सामाजिक व्यवस्था को कमजोर करने की आशंका जताई जा रही है।

आदिवासी नेताओं का कहना है कि पेसा कानून का मूल उद्देश्य आदिवासी समाज की रूढ़िजन्य विधियों, सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं, परंपराओं और स्वशासन प्रणाली को संवैधानिक संरक्षण देना है। लेकिन झारखंड में बनाए गए नियमों में रूढ़िजन्य विधि और धार्मिक प्रथा जैसे महत्वपूर्ण शब्दों को ही हटा दिया गया है।

आरोप है कि पहले सरकार ने ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल (TAC) से राज्यपाल को अलग किया और अब शेड्यूल एरिया में राज्यपाल के अधिकारों को सीमित कर उपायुक्त को अधिक अधिकार दिए जा रहे हैं, जिससे प्रशासन मनमानी कर सके।

नियमावली में ग्राम सभाओं के अधिकार भी सीमित कर दिए गए हैं। पहले ग्राम सभा राज्य की योजनाओं और DMFT जैसे कार्यक्रमों को स्वीकृति देती थी, लेकिन अब केवल सहमति ली जाएगी। यदि 30 दिनों के भीतर सहमति नहीं दी गई तो योजना को स्वीकृत मान लिया जाएगा। इसे ग्राम सभा के अधिकारों का हनन बताया जा रहा है।

लघु खनिज जैसे बालू, मिट्टी, पत्थर और मोरम पर पहले ग्राम सभा का पूर्ण अधिकार था, लेकिन अब उन्हें केवल “सरकारी निर्देशों का पालन” करना होगा। इसी तरह CNT/SPT एक्ट के उल्लंघन पर भूमि की वापसी का अधिकार और जमीन हस्तांतरण से पहले ग्राम सभा की सहमति का प्रावधान भी हटा दिया गया है।

नियमावली में शेड्यूल एरिया में लगने वाले उद्योगों को लेकर कोई स्पष्ट गाइडलाइन नहीं है। सवाल उठाया जा रहा है कि यदि कंपनियां मुनाफा कमाएं और आदिवासी विस्थापित होते जाएं, तो ऐसे विकास का क्या अर्थ है। आदिवासी समाज का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि जमीन देने के बदले प्रभावित परिवारों को उद्योगों के लाभ में हिस्सेदार बनाया जाए।

आरोप लगाया गया कि जिस दिन कैबिनेट में पेसा अधिनियम को मंजूरी दी गई, उसी दिन नोवामुंडी (पश्चिम सिंहभूम) में हिंडाल्को को करीब 850 एकड़ जमीन बिना ग्राम सभा की सहमति के दे दी गई। इस भूमि पर आदिवासी वर्षों से खेती, पशुपालन करते आए हैं और वहां देशाउली व जाहेरस्थान भी स्थित है। ग्रामीण इसका विरोध कर रहे हैं।

आदिवासी संगठनों का कहना है कि सरकार को शेड्यूल एरिया में शराब की दुकानों और भट्ठियों की याद तो रही, लेकिन आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी की गई। उन्होंने ऐलान किया है कि वे गांव-गांव जाकर इस नियमावली और आदिवासी अधिकारों को कमजोर करने की कोशिशों का विरोध करेंगे।