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डोम्बारी बुरू नरसंहार: 126 साल बाद भी जिंदा है शहीदों की याद

डोम्बारी बुरू नरसंहार: 126 साल बाद भी जिंदा है शहीदों की याद

खूंटी : खूंटी जिले स्थित डोम्बारी बुरू में 1900 के ऐतिहासिक नरसंहार के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। 126 वर्ष पहले इसी दिन ब्रिटिश औपनिवेशिक सेना ने जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के लिए जुटे सैकड़ों निहत्थे आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी। इस भीषण हमले में पहाड़ी और पास बहती ताजना नदी की सहायक धारा खून से लाल हो गई थी।

यह नरसंहार धरती आबा बिरसा मुंडा के नेतृत्व में चल रहे उलगुलान (महान विद्रोह) के दौरान हुआ। “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” के नारे के साथ मुंडा और अन्य आदिवासी समुदायों के लोग डोम्बारी बुरू पर एकत्र हुए थे। ब्रिटिश गुप्तचरों की सूचना पर सेना ने पहाड़ी को घेरकर बिना चेतावनी गोलीबारी और तोपों का इस्तेमाल किया। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों तक को नहीं बख्शा गया।

ब्रिटिश रिपोर्ट में जहां 11–12 मौतों का दावा किया गया, वहीं समकालीन अखबारों, लोकगीतों और लोककथाओं में हजारों शहीदों का उल्लेख मिलता है। 1957 की बिहार सरकार की रिपोर्ट में लगभग 200 मौतों का अनुमान लगाया गया है। स्थानीय स्मारक पर हाथीराम मुंडा, सिंगराई मुंडा, हाड़ी मुंडा, मझिया मुंडा सहित कुछ शहीदों के नाम अंकित हैं, जबकि अधिकांश शहीद गुमनाम रह गए।

इस हमले में बिरसा मुंडा बच निकले थे, लेकिन बाद में गिरफ्तार कर रांची जेल में उनकी रहस्यमय मृत्यु हो गई। आज डोम्बारी बुरू पर 110 फीट ऊंचा शहीद स्तंभ और धरती आबा बिरसा मुंडा की प्रतिमा स्थापित है। हर वर्ष 9 जनवरी को यहां शहीद दिवस मनाया जाता है, जिसमें हजारों लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

डोम्बारी बुरू का बलिदान आज भी आदिवासी समाज के संघर्ष और अधिकारों की याद दिलाता है।