चाईबासा | पश्चिम सिंहभूम जिले के मनोहरपुर प्रखंड अंतर्गत डिंबुली राजस्व ग्राम में उद्योग स्थापना के नाम पर अधिग्रहित की गई 110.53 एकड़ रैयती भूमि की वापसी की मांग अब निर्णायक चरण में पहुंचती नजर आ रही है। वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे प्रभावित रैयतों के पक्ष में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) तथा भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने संज्ञान लेते हुए झारखंड सरकार और जिला प्रशासन को मामले की जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2005 में M/s V. Dempo & Co. Pvt. Ltd. द्वारा उद्योग स्थापना के उद्देश्य से छोटानागपुर काश्तकारी (CNT) अधिनियम की धारा-49 के तहत डिंबुली क्षेत्र के आदिवासी रैयतों से 110.53 एकड़ भूमि खरीदी गई थी। उस समय संबंधित टी.ए. मिस केस (T.A. Misc. Case) की सुनवाई के दौरान पश्चिम सिंहभूम के उपायुक्त द्वारा यह शर्त निर्धारित की गई थी कि तय अवधि के भीतर औद्योगिक इकाई स्थापित की जाएगी। ऐसा नहीं होने की स्थिति में भूमि मूल रैयतों को वापस लौटाई जाएगी।

हालांकि, भूमि अधिग्रहण के लगभग दो दशक बाद भी न तो क्षेत्र में कोई उद्योग स्थापित हो सका और न ही भूमि रैयतों को वापस की गई। इसके बाद प्रभावित रैयतों ने अपनी जमीन की वापसी की मांग को लेकर लगातार आवाज उठाई।
इस मुद्दे को लेकर भारत आदिवासी पार्टी, पश्चिम सिंहभूम के जिलाध्यक्ष सुशील बारला के नेतृत्व में रैयतों ने वर्ष 2022 और 2023 में जिला प्रशासन तथा राज्य सरकार को कई ज्ञापन सौंपे थे। इसके बाद 25 फरवरी 2026 को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय को विस्तृत आवेदन भेजकर हस्तक्षेप की मांग की गई।
आवेदन पर संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने 18 मार्च 2026 को पश्चिम सिंहभूम के उपायुक्त को नोटिस जारी कर 15 दिनों के भीतर मामले से संबंधित रिपोर्ट तथा अब तक की गई कार्रवाई का विवरण उपलब्ध कराने को कहा है। वहीं, भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने 21 मई 2026 को झारखंड सरकार के जनजातीय कल्याण विभाग को पत्र भेजकर मामले की जांच कर उचित कार्रवाई करने का अनुरोध किया है।

केंद्र सरकार और राष्ट्रीय आयोग के हस्तक्षेप से डिंबुली के प्रभावित रैयतों में नई उम्मीद जगी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि निर्धारित शर्तों के अनुरूप उद्योग स्थापित नहीं हुआ है, तो CNT अधिनियम की मूल भावना के तहत उनकी पुश्तैनी जमीन उन्हें वापस मिलनी चाहिए।

भारत आदिवासी पार्टी के जिलाध्यक्ष सुशील बारला ने कहा कि यह केवल भूमि का मामला नहीं, बल्कि आदिवासी समुदाय के अधिकार, अस्तित्व और न्याय से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि लंबे संघर्ष के बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा मामले का संज्ञान लिया जाना रैयतों की लड़ाई की बड़ी सफलता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि संबंधित विभाग शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेकर प्रभावित परिवारों को न्याय दिलाएंगे।

फिलहाल, इस मामले में जिला प्रशासन और झारखंड सरकार की आगामी कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वर्षों से लंबित इस मामले में प्रभावित रैयतों को उनकी भूमि वापस मिल पाती है या नहीं।

