रांची : भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में हाल ही में लागू किए गए UGC (University Grants Commission) के “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मीनारायण मुंडा ने इन नियमों पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे केवल शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक एकता और संप्रभुता के लिए खतरा बताया है।
लक्ष्मीनारायण मुंडा का कहना है कि ये नियम सतही तौर पर जाति-आधारित भेदभाव रोकने का दावा करते हैं, लेकिन वास्तव में यह एकतरफा और विभाजनकारी नीति है। उन्होंने आरोप लगाया कि नियमों में भेदभाव की परिभाषा केवल SC, ST और OBC वर्गों तक सीमित रखी गई है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए किसी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई है। इससे कैंपस में असंतुलन और तनाव बढ़ने की आशंका है।
UGC 2026 के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी कमेटी, इक्विटी एंबेसडर और हेल्पलाइन गठित करने का प्रावधान किया गया है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इससे शिक्षा परिसरों में शिकायतों की राजनीति को बढ़ावा मिलेगा और शैक्षणिक माहौल प्रभावित होगा।
गौरतलब है कि इन नियमों को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए। कई छात्र संगठनों ने इसे “कैंपस में अराजकता फैलाने वाला” बताया। 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन नियमों पर रोक लगाए जाने के बावजूद, राजनीतिक और सामाजिक बहस थमी नहीं है। भाजपा से जुड़े कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं के इस्तीफे भी सामने आए हैं।
लक्ष्मीनारायण मुंडा ने केंद्र की भाजपा सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का दावा करने वाली सरकार ने इस तरह के नियम क्यों लागू किए। उन्होंने 2019 से चली आ रही जनहित याचिकाओं का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की आड़ में सरकार ने ऐसे प्रावधानों को आगे बढ़ाया, जो समाज को बांटने का काम कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि UGC 2026 नियमों को National Education Policy (NEP) 2020, Free Trade Agreement (FTA) और World Economic Forum (WEF) से अलग नहीं देखा जा सकता। उनका दावा है कि भारत-यूरोपीय संघ FTA और विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति से भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर वैश्विक नियंत्रण बढ़ेगा।
WEF के साथ स्किल डेवलपमेंट को लेकर हुए समझौतों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि इससे भारत को “ग्लोबल स्किल हब” बनाने के नाम पर युवाओं को सस्ते श्रम के रूप में तैयार किया जा रहा है। उनका आरोप है कि ‘इक्विटी’ के नाम पर छात्रों को आपस में बांटकर वैश्विक पूंजीवाद के हित साधे जा रहे हैं।
मुंडा ने कहा कि यह नीति न तो वास्तविक समानता लाएगी और न ही रोजगार या विकास। बल्कि इससे भारत की शिक्षा, संस्कृति और संप्रभुता कमजोर होगी। उन्होंने छात्रों, युवाओं और नागरिकों से जागरूक होने और सरकार से जवाब मांगने की अपील की।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या देश वैश्विक पूंजीवाद की गुलामी की ओर बढ़ रहा है और क्या भारत को एक “वैश्विक कॉलोनी” में बदला जा रहा है। उनके अनुसार अब समय आ गया है कि इस पूरी नीति और इसके पीछे के एजेंडे को सार्वजनिक बहस में लाया जाए।
UGC 2026 नियमों को लेकर देशभर में विवाद, लक्ष्मीनारायण मुंडा ने जताई गहरी आपत्ति

