रांची | झारखंड के 200 से अधिक आदिवासी, मूलवासी, जन संगठनों के प्रतिनिधियों, पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के पदाधिकारियों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने संयुक्त वक्तव्य जारी कर राज्यवासियों से 9 जून को धरती आबा बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर जन कार्यक्रम आयोजित करने की अपील की है। अपील में कहा गया है कि इस दिन आदिवासी संस्कृति, संघर्ष और उलगुलान की विरासत को याद करते हुए राज्य के विभिन्न हिस्सों में कार्यक्रम आयोजित किए जाएं तथा बिरसा मुंडा की विरासत को आरएसएस, जनजाति सुरक्षा मंच और वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों द्वारा कथित रूप से किए जा रहे वैचारिक हस्तक्षेप से बचाने का संकल्प लिया जाए।

संयुक्त अपील पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव, पूर्व विधायक बहादुर उरांव और मंगल सिंह बोबोंगा, ज्योत्सना केरकेट्टा, देवकीनंदन बेदिया, कुमारचंद्र मार्डी, डेमका सोय, रमेश जराई, रजनी मुर्मू, सुखनाथ लोहरा, दुर्गावती उरांव, अलोका कुजूर, बिंसाय मुंडा, हरी कुमार भगत, कालीचरण बिरुवा, दिनेश मुर्मू, साधु हो, जयकिशन गोडसोरा और वासवी किड़ो सहित अनेक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल हैं। इसके अलावा शिक्षाविद एवं सांस्कृतिक क्षेत्र के प्रमुख हस्ताक्षरों में जसिन्ता केरकेट्टा, जोसेफ बाड़ा, अनुज लुगुन और नीतीश खलखो के नाम भी शामिल हैं।

अपील का समर्थन करने वाले संगठनों में अखिल भारतीय आदिवासी विकास समिति, गाँव गणराज्य परिषद, सरना सगोम समिति (खूंटी), आदिवासी संघर्ष मोर्चा, आदिवासी मूलवासी अधिकार मंच (बोकारो), भारत जकत माझी परगना महल (रामगढ़), पारंपरिक ग्राम सभा समन्वय समिति (खूंटी), आदिवासी अधिकार मंच, मानकी-मुंडा स्वशासन व्यवस्था (पश्चिमी सिंहभूम), आदिवासी हो समाज सेवानिवृत्त संगठन (चाईबासा), आदिवासी आंदोलनकारी मोर्चा, आदिवासी समन्वय समिति, बिरसा सेना, आदिवासी एकता मंच, मुंडा आदिवासी समाज महासभा, संयुक्त ग्राम सभा, युवा झुमुर, झारखंड जनाधिकार महासभा, जोहार, ओमोन महिला संगठन और झारखंड जनतांत्रिक महासभा सहित कई संगठन शामिल हैं।

वक्तव्य में यह भी उल्लेख किया गया है कि आदिवासी अधिकारों के मुद्दों पर कार्यरत राष्ट्रीय स्तर के सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों, जैसे नंदिनी सुंदर, बेला भाटिया, प्रफुल्ल समंतरा और ईश्वर आहिरे ने भी इस अपील का समर्थन किया है।
संयुक्त अपील में 24 मई 2026 को दिल्ली में आयोजित जनजाति सांस्कृतिक समागम का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं, विशेषकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, ने आदिवासियों को बार-बार “वनवासी” कहकर संबोधित किया। वक्तव्य में आरोप लगाया गया है कि कार्यक्रम में बिरसा मुंडा के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के संघर्ष तथा शोषण के विरुद्ध उनके आंदोलन का उल्लेख नहीं किया गया।

अपील जारी करने वालों का कहना है कि आरएसएस और उससे जुड़े संगठन “आदिवासी” शब्द के बजाय “वनवासी” शब्द का प्रयोग करते हैं और आदिवासी समाज की स्वतंत्र पहचान को कमजोर करने का प्रयास करते हैं। वक्तव्य में आरोप लगाया गया है कि “सरना-सनातन एक” जैसे नारों के माध्यम से आदिवासियों की अलग सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को समाप्त करने तथा ईसाई आदिवासियों की डिलिस्टिंग की मांग के जरिए आदिवासी समाज की एकजुटता को तोड़ने की कोशिश की जा रही है।
वक्तव्य में कहा गया है कि बिरसा मुंडा का उलगुलान जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा औपनिवेशिक शासन एवं शोषणकारी शक्तियों के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक था, जिसने झारखंड आंदोलन की वैचारिक नींव रखी। अपीलकर्ताओं ने आरोप लगाया कि संघ परिवार और उससे जुड़े संगठन इस इतिहास की नई व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।
संयुक्त वक्तव्य में पूर्व की भाजपा सरकार द्वारा छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) में संशोधन के प्रयासों का भी उल्लेख किया गया है। वक्तव्य में कहा गया है कि आदिवासी स्वायत्तता, जल-जंगल-जमीन से जुड़े संवैधानिक अधिकारों तथा सरना धर्म को अलग धार्मिक कोड के रूप में मान्यता देने जैसी मांगों के प्रति भी विरोध का रुख अपनाया गया है।
अपील के अंत में आदिवासियों, मूलवासियों, झारखंडियों और आदिवासियत समर्थकों से आह्वान किया गया है कि वे 9 जून को बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर उनकी विरासत, संघर्ष और विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कार्यक्रम आयोजित करें तथा उनकी ऐतिहासिक विरासत की रक्षा के लिए एकजुट हों।

